deeda-e-be-rang men khoon-rang manzar rakh diye | दीदा-ए-बे-रंग में ख़ूँ-रंग मंज़र रख दिए

  - Bakhsh Layalpuri
दीदा-ए-बे-रंगमेंख़ूँ-रंगमंज़ररखदिए
हमनेइसदश्त-ए-तपाँमेंभीसमुंदररखदिए
वोजगहजोलाल-ओ-गौहरकेलिएमक़्सूदथी
किसनेयेसंग-ए-मलामतउसजगहपररखदिए
अबकिसीकीचीख़क्याउभरेकिमीर-ए-शहरने
साकिनान-ए-शहरकेसीनोंपेपत्थररखदिए
शाख़-सारोंपरजबइज़्न-ए-नशेमनमिलसका
हमनेअपनेआशियाँदोश-ए-हवापररखदिए
अहल-ए-ज़रनेदेखकरकम-ज़र्फ़ी-ए-अहल-ए-क़लम
हिर्स-ए-ज़रकेहरतराज़ूमेंसुख़न-वररखदिए
हमतोअबरेशमकीसूरतनर्म-ओ-नाज़ुकथेमगर
तल्ख़ी-ए-हालातनेलहजेमेंख़ंजररखदिए
जिसहवाकोवोसमझतेथेकिचलसकतीनहीं
उसहवानेकाटकरलश्करकेलश्कररखदिए
'बख़्श'सय्याद-ए-अज़लनेहुक्म-ए-आज़ादीकेसाथ
औरअसीरीकेभीख़दशेदलकेअंदररखदिए
  - Bakhsh Layalpuri
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