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Fahmi Badayuni
teri KHushboo ko qaid men rakhna
teri KHushboo ko qaid men rakhna | तेरी ख़ुशबू को क़ैद में रखना
- Fahmi Badayuni
तेरी
ख़ुशबू
को
क़ैद
में
रखना
इत्रदानों
के
बस
की
बात
नहीं
- Fahmi Badayuni
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इश्क़
करना
इक
सज़ा
है
क्या
करें
इश्क़
का
अपना
मज़ा
है
क्या
करें
Syed Naved Imam
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हम
ने
क़ुबूल
कर
लिया
अपना
हर
एक
जुर्म
अब
आप
भी
तो
अपनी
अना
छोड़
दीजिए
Harsh saxena
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क्या
जाने
किस
ख़ता
की
सज़ा
दी
गई
हमें
रिश्ता
हमारा
दार
पे
लटका
दिया
गया
शादी
में
सब
पसंद
का
लाया
गया
मगर
अपनी
पसंद
का
उसे
दूल्हा
नहीं
मिला
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Afzal Ali Afzal
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शौक़,लत,आवारगी,अय्याशी
में
गुज़री
हमारी
ज़िन्दगी
अब
तू
मुनासिब
सी
सज़ा
दे
गिनती
करके
Kartik tripathi
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सज़ा
सच
बोलने
की
यह
मिली
है
सभी
ने
कर
लिया
हम
से
किनारा
Meem Alif Shaz
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करे
जो
क़ैद
जुनूँ
को
वो
जाल
मत
देना
हो
जिस
में
होश
उसे
ऐसा
हाल
मत
देना
जो
मुझ
सेे
मिलने
का
तुमको
कभी
ख़याल
आए
तो
इस
ख़याल
को
तुम
कल
पे
टाल
मत
देना
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Kashif Adeeb Makanpuri
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मुन्सिफ़
हो
अगर
तुम
तो
कब
इंसाफ़
करोगे
मुजरिम
हैं
अगर
हम
तो
सज़ा
क्यूँँ
नहीं
देते
Ahmad Faraz
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आधी
आधी
रात
तक
सड़कों
के
चक्कर
काटिए
शा'इरी
भी
इक
सज़ा
है
ज़िंदगी
भर
काटिए
कोई
तो
हो
जिस
से
उस
ज़ालिम
की
बातें
कीजिए
चौदहवीं
का
चाँद
हो
तो
रात
छत
पर
काटिए
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Nisar Nasik
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मसाइल
तो
बहुत
से
हैं
मगर
बस
एक
ही
हल
है
सहरस
शाम
तक
सर
मेरा
है
बेगम
की
चप्पल
है
मेरे
मालिक
भला
इस
सेे
बुरी
भी
क्या
सज़ा
होगी
मेरा
शादीशुदा
होना
ही
दोज़ख़
की
रिहर्सल
है
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Paplu Lucknawi
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मिरी
सुब्ह
का
यूँँ
भी
इज़हार
हो
पियाला
हो
कॉफ़ी
का
अख़बार
हो
कोई
जुर्म
साबित
न
हो
उसका
फिर
जो
तेरी
हँसी
में
गिरफ़्तार
हो
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Swapnil Tiwari
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कोई
मिलता
नहीं
ख़ुदा
की
तरह
फिरता
रहता
हूँ
मैं
दु'आ
की
तरह
ग़म
तआक़ुब
में
हैं
सज़ा
की
तरह
तू
छुपा
ले
मुझे
ख़ता
की
तरह
है
मरीज़ों
में
तज़्किरा
मेरा
आज़माई
हुई
दवा
की
तरह
हो
रहीं
हैं
शहादतें
मुझ
में
और
मैं
चुप
हूँ
कर्बला
की
तरह
जिस
की
ख़ातिर
चराग़
बनता
हूँ
घूरता
है
वही
हवा
की
तरह
वक़्त
के
गुम्बदों
में
रहता
हूँ
एक
गूँजी
हुई
सदा
की
तरह
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Fahmi Badayuni
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जब
रेतीले
हो
जाते
हैं
पर्वत
टीले
हो
जाते
हैं
तोड़े
जाते
हैं
जो
शीशे
वो
नोकीले
हो
जाते
हैं
बाग़
धुएँ
में
रहता
है
तो
फल
ज़हरीले
हो
जाते
हैं
नादारी
में
आग़ोशों
के
बंधन
ढीले
हो
जाते
हैं
फूलों
को
सुर्ख़ी
देने
में
पत्ते
पीले
हो
जाते
हैं
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Fahmi Badayuni
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वफ़ा-दारी
ग़नीमत
हो
गई
क्या
मोहब्बत
भी
मुरव्वत
हो
गई
क्या
अदालत
फ़र्श-ए-मक़्तल
धो
रही
है
उसूलों
की
शहादत
हो
गई
क्या
ज़रा
ईमान-दारी
से
बताओ
हमें
तुम
से
मोहब्बत
हो
गई
क्या
फ़रिश्तों
जैसी
सूरत
क्यूँँ
बना
ली
कोई
हम
से
शरारत
हो
गई
क्या
किताबत
रोकने
का
क्या
सबब
है
कहानी
की
इशाअत
हो
गई
क्या
मज़ार-ए-पीर
से
आवाज़
आई
फ़क़ीरी
बादशाहत
हो
गई
क्या
घटाएँ
पूछने
को
आ
रही
हैं
हमारी
छत
की
हालत
हो
गई
क्या
ये
कैसा
जश्न
है
उस
की
गली
में
कोई
बंदिश
इजाज़त
हो
गई
क्या
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Fahmi Badayuni
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उसने
ख़त
का
जवाब
भेजा
है
चार
लेकिन
हैं
एक
हाँ
के
साथ
Fahmi Badayuni
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घर
बनाना
बहोत
ज़रूरी
है
क़ैदखाना
बहोत
ज़रूरी
है
फूल
खिलने
से
फल
उतरते
हैं
मुस्कुराना
बहोत
ज़रूरी
है
महफिलें
बे-सबब
नहीं
जमती
एक
फसाना
बहोत
ज़रूरी
है
अब
के
दरवाज़ा
ख़ुद
सजाया
है
तेरा
आना
बहोत
ज़रूरी
है
आ
समाँ
में
ज़मीन
वालो
का
इक
ठिकाना
बहोत
ज़रूरी
है
अब
के
वो
बे-सबब
ही
रूठा
है
अब
मनाना
बहोत
ज़रूरी
है
कितने
ज़िंदा
हैं
हम,
पता
तो
चला
ज़हर
खाना
बहोत
ज़रूरी
है
सर
उठाने
के
वास्ते
"फ़हमी"
सर
झुकाना
बहुत
ज़रूरी
है
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Fahmi Badayuni
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