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Adil Mansuri
phoolon ki sej par zaraa aaraam kya kiyaus gul-badan pe naqsh uth aa.e gulaab ke
phoolon ki sej par zaraa aaraam kya kiyaus gul-badan pe naqsh uth aa.e gulaab ke | फूलों की सेज पर ज़रा आराम क्या किया
- Adil Mansuri
फूलों
की
सेज
पर
ज़रा
आराम
क्या
किया
उस
गुल-बदन
पे
नक़्श
उठ
आए
गुलाब
के
- Adil Mansuri
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जता
दिया
कि
मोहब्बत
में
ग़म
भी
होते
हैं
दिया
गुलाब
तो
काँटे
भी
थे
गुलाब
के
साथ
Rehman Faris
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दिन
में
आने
लगे
हैं
ख़्वाब
मुझे
उस
ने
भेजा
है
इक
गुलाब
मुझे
Iftikhar Raghib
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किए
कराए
का
सारा
हिसाब
दूँगा
मैं
सवाल
जो
भी
करोगे
जवाब
दूँगा
मैं
ये
रख-रखाव
कभी
ख़त्म
होने
वाला
नहीं
बिछड़ते
वक़्त
भी
तुझको
गुलाब
दूँगा
मैं
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Khurram Afaq
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नए
दौर
के
नए
ख़्वाब
हैं
नए
मौसमों
के
गुलाब
हैं
ये
मोहब्बतों
के
चराग़
हैं
इन्हें
नफ़रतों
की
हवा
न
दे
Bashir Badr
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माइल
न
करते
क़ीमती
तोहफ़े
मुझे
दिल
जीतना
है
जो
मेरा
तो
ला
गुलाब
Ghazala Tabassum
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मेरे
साथ
हँसने
वालों
शरीक
हों
दुख
में
गर
गुलाब
की
ख़्वाहिश
है
तो
चूम
काँटों
को
Neeraj Neer
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नाज़ुकी
उस
के
लब
की
क्या
कहिए
पंखुड़ी
इक
गुलाब
की
सी
है
Meer Taqi Meer
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हर
कोई
फूल-सा
है
लेकिन
वो
फूल
में
फूल
है
गुलाब
का
फूल
Ramnath Shodharthi
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बुरी
सरिश्त
न
बदली
जगह
बदलने
से
चमन
में
आ
के
भी
काँटा
गुलाब
हो
न
सका
Arzoo Lakhnavi
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मेरे
हाथों
में
कुछ
गुलाब
तो
हैं
जो
न
मुमकिन
रहे
वो
ख़्वाब
तो
हैं
Shaista mufti
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कोई
ख़ुद-कुशी
की
तरफ़
चल
दिया
उदासी
की
मेहनत
ठिकाने
लगी
Adil Mansuri
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नींद
भी
जागती
रही
पूरे
हुए
न
ख़्वाब
भी
सुब्ह
हुई
ज़मीन
पर
रात
ढली
मज़ार
में
Adil Mansuri
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तू
किस
के
कमरे
में
थी
मैं
तेरे
कमरे
में
था
Adil Mansuri
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बदन
पर
नई
फ़स्ल
आने
लगी
हवा
दिल
में
ख़्वाहिश
जगाने
लगी
कोई
ख़ुद-कुशी
की
तरफ़
चल
दिया
उदासी
की
मेहनत
ठिकाने
लगी
जो
चुप-चाप
रहती
थी
दीवार
पर
वो
तस्वीर
बातें
बनाने
लगी
ख़यालों
के
तारीक
खंडरात
में
ख़मोशी
ग़ज़ल
गुनगुनाने
लगी
ज़रा
देर
बैठे
थे
तन्हाई
में
तिरी
याद
आँखें
दुखाने
लगी
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Adil Mansuri
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पानी
को
पत्थर
कहते
हैं
क्या
कुछ
दीदा-वर
कहते
हैं
ख़ुश-फ़हमी
की
हद
होती
हैं
ख़ुद
को
दानिश-वर
कहते
हैं
कौन
लगी-लिपटी
रखता
है
हम
तेरे
मुँह
पर
कहते
हैं
ठीक
ही
कहते
होंगे
फिर
तो
जब
ये
प्रोफ़ेसर
कहते
हैं
सब
उन
को
अंदर
समझे
थे
वो
ख़ुद
को
बाहर
कहते
हैं
तेरा
इस
में
क्या
जाता
है
अपने
खंडर
को
घर
कहते
हैं
नज़्म
समझ
में
कब
आती
है
देख
इस
को
मंतर
कहते
हैं
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Adil Mansuri
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