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Adil Mansuri
paani ko patthar kahte hain
paani ko patthar kahte hain | पानी को पत्थर कहते हैं
- Adil Mansuri
पानी
को
पत्थर
कहते
हैं
क्या
कुछ
दीदा-वर
कहते
हैं
ख़ुश-फ़हमी
की
हद
होती
हैं
ख़ुद
को
दानिश-वर
कहते
हैं
कौन
लगी-लिपटी
रखता
है
हम
तेरे
मुँह
पर
कहते
हैं
ठीक
ही
कहते
होंगे
फिर
तो
जब
ये
प्रोफ़ेसर
कहते
हैं
सब
उन
को
अंदर
समझे
थे
वो
ख़ुद
को
बाहर
कहते
हैं
तेरा
इस
में
क्या
जाता
है
अपने
खंडर
को
घर
कहते
हैं
नज़्म
समझ
में
कब
आती
है
देख
इस
को
मंतर
कहते
हैं
- Adil Mansuri
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अब
ये
भी
नहीं
ठीक
कि
हर
दर्द
मिटा
दें
कुछ
दर्द
कलेजे
से
लगाने
के
लिए
हैं
Jaan Nisar Akhtar
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ख़ुशरंग
नज़र
आता
है
जाज़िब
नहीं
लगता
माहौल
मेरे
दिल
से
मुख़ातिब
नहीं
लगता
मैं
भी
नहीं
हर
शे'र
में
मौजूद
ये
सच
है
ग़ालिब
भी
हर
इक
शे'र
में
ग़ालिब
नहीं
लगता
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Obaid Azam Azmi
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तू
है
मुस्लिम
वो
पण्डित
की
बेटी
है
उस
लड़की
पर
तेरा
मरना
ठीक
नहीं
Shadab Asghar
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बस
एक
लम्हे
के
सच
झूट
के
एवज़
'फ़रहत'
तमाम
उम्र
का
इल्ज़ाम
ले
गया
मुझ
से
Farhat Abbas Shah
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ये
तुम
भी
जानते
हो
कि
हालात
नर्म
है
कहने
को
कह
रहा
हूँ
कि
सब
ठीक
ठाक
है
shaan manral
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परवरदिगार
आपके
सब
फैसले
अजीब
हैं
जो
तंग
था
वो
तंग
है
जो
ठीक
था
वो
मर
गया
Adnan Raza
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जब
राह
झूठ
की
चुनी
तो
लिफ़्ट
भी
मिली
और
सच
की
राह
में
मिले
पैरों
के
बस
निशाँ
Tanoj Dadhich
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कुछ
भी
नहीं
तो
पेड़
की
तस्वीर
ही
सही
घर
में
थोड़ी
बहुत
तो
हरियाली
चाहिये
Himanshu Kiran Sharma
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हमको
हकीम
ने
ही
किया
ठीक
दोस्तों
हम
पर
किसी
के
लम्स
ने
जादू
नहीं
किया
Tanoj Dadhich
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सच
कहें
तो
वो
कहानी
बीच
में
दम
तोड़
देगी
जिस
कहानी
को
सभी
किरदार
छोड़े
जा
रहे
हैं
Anurag Pandey
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बदन
पर
नई
फ़स्ल
आने
लगी
हवा
दिल
में
ख़्वाहिश
जगाने
लगी
कोई
ख़ुद-कुशी
की
तरफ़
चल
दिया
उदासी
की
मेहनत
ठिकाने
लगी
जो
चुप-चाप
रहती
थी
दीवार
पर
वो
तस्वीर
बातें
बनाने
लगी
ख़यालों
के
तारीक
खंडरात
में
ख़मोशी
ग़ज़ल
गुनगुनाने
लगी
ज़रा
देर
बैठे
थे
तन्हाई
में
तिरी
याद
आँखें
दुखाने
लगी
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Adil Mansuri
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तू
किस
के
कमरे
में
थी
मैं
तेरे
कमरे
में
था
Adil Mansuri
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ख़ुद-ब-ख़ुद
शाख़
लचक
जाएगी
फल
से
भरपूर
तो
हो
लेने
दो
Adil Mansuri
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मेरे
टूटे
हौसले
के
पर
निकलते
देख
कर
उस
ने
दीवारों
को
अपनी
और
ऊँचा
कर
दिया
Adil Mansuri
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फिर
बालों
में
रात
हुई
फिर
हाथों
में
चाँद
खिला
Adil Mansuri
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