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Farhat Abbas Shah
bas ek lamhe ke sach jhooth ke evaz farhat
bas ek lamhe ke sach jhooth ke evaz farhat | बस एक लम्हे के सच झूट के एवज़ 'फ़रहत'
- Farhat Abbas Shah
बस
एक
लम्हे
के
सच
झूट
के
एवज़
'फ़रहत'
तमाम
उम्र
का
इल्ज़ाम
ले
गया
मुझ
से
- Farhat Abbas Shah
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वो
झूठ
बोल
रहा
था
बड़े
सलीक़े
से
मैं
एतिबार
न
करता
तो
और
क्या
करता
Waseem Barelvi
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किसी
भी
शख़्स
के
झूठे
दिलासे
में
नहीं
आती
कहानी
हो
अगर
लंबी
तराशे
में
नहीं
आती
जहाँ
में
अब
कहाँ
कोई
जो
मजनूँ
की
तरह
चाहे
मोहब्बत
इसलिए
भी
अब
तमाशे
में
नहीं
आती
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Ansar Ethvi
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किसी
उम्मीद
का
ये
इस्तिआरा
जान
पड़ता
है
कि
तन्हा
ही
सही
सच
झूट
से
अब
रोज़
लड़ता
है
Tarun Pandey
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मुक़ाबिल
फ़ासलों
से
ही
मोहब्बत
डूब
जाएगी
सुनोगी
झूठी
बातें
तुम
हक़ीक़त
डूब
जाएगी
चलेगी
तब
तलक
जब
तक
तिरी
परछाईं
देखेगी
तिरा
जब
हुस्न
देखेगी
सियासत
डूब
जाएगी
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Anurag Pandey
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कोई
वा'दा
न
देंगे
दान
में
क्या
झूट
तक
अब
नहीं
ज़बान
में
क्या
Tufail chaturvedi
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वो
बहुत
चालाक
है
लेकिन
अगर
हिम्मत
करें
पहला
पहला
झूट
है
उस
को
यक़ीं
आ
जाएगा
Zafar Iqbal
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तुम
मिरे
साथ
हो
ये
सच
तो
नहीं
है
लेकिन
मैं
अगर
झूट
न
बोलूँ
तो
अकेला
हो
जाऊँ
Ahmad Kamal Parvazi
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आगे
चलकर
जिस
सेे
शादी
करनी
हो
पहले
दिन
से
झूठ
नहीं
कहते
उस
सेे
Tanoj Dadhich
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मोहब्बत
जब
तलक
होती
नहीं
है
मोहब्बत
झूठ
लगती
है
सभी
को
Umesh Maurya
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झूट
वाले
कहीं
से
कहीं
बढ़
गए
और
मैं
था
कि
सच
बोलता
रह
गया
Waseem Barelvi
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ये
दिल
मलूल
भी
कम
है
उदास
भी
कम
है
कई
दिनों
से
कोई
आस
पास
भी
कम
है
हमें
भी
यूँं
ही
गुजरना
पसंद
है
और
फिर
तुम्हारा
शहर
मुसाफ़िर-शनास
भी
कम
है
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Farhat Abbas Shah
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कहा
मैं
कहाँ
हो
तुम
जवाब
आया
जहाँ
हो
तुम
मिरे
जीवन
से
ज़ाहिर
हो
मिरे
ग़म
में
निहाँ
हो
तुम
मिरी
तो
सारी
दुनिया
हो
मिरा
सारा
जहाँ
हो
तुम
मिरी
सोचों
के
मेहवर
हो
मिरा
ज़ोर-ए-बयाँ
हो
तुम
मैं
तो
लफ़्ज़-ए-मोहब्बत
हूँ
मगर
मेरी
ज़बाँ
हो
तुम
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Farhat Abbas Shah
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है
किसी
जालिम
उदू
की
घात
दरवाज़े
में
है
या
मसाफ़त
है
नई
या
रात
दरवाज़े
में
है
जिस
तरहा
उठती
है
नजरें
बे-इरादा
बार-बार
साफ़
लगता
है
के
कोई
बात
दरवाजे
में
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Farhat Abbas Shah
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दिल
भी
आवारा
नज़र
आवारा
कट
गया
सारा
सफ़र
आवारा
ज़िंदगी
भटका
हुआ
जंगल
है
राह
बेचैन
शजर
आवारा
रूह
की
खिड़की
से
हम
झाँकते
हैं
और
लगता
है
नगर
आवारा
तुझ
को
मा'लूम
कहाँ
होगा
कि
शब
कैसे
करते
हैं
बसर
आवारा
मुझ
को
मा'लूम
है
अपने
बारे
हूँ
बहुत
अच्छा
मगर
आवारा
ये
अलग
बात
कि
बस
पल-दो-पल
लौट
के
आते
हैं
घर
आवारा
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Farhat Abbas Shah
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ज़िंदगी
के
बहुत
मसाइल
हैं
हर
क़दम
पर
पहाड़
हाइल
हैं
ऐ
दिल-ए-बे-क़रार
मुद्दत
से
हम
तिरी
वहशतों
के
क़ाइल
हैं
ऐसे
तकते
हैं
आप
की
जानिब
जैसे
मौसम
नहीं
हैं
साइल
हैं
फूल
ख़ुश्बू
हवा
शजर
बारिश
एक
तेरी
तरफ़
ही
माइल
हैं
फ़ासला
तो
बहुत
ही
कम
है
मगर
दरमियाँ
में
कई
मसाइल
हैं
उस
के
चेहरे
के
सामने
'फ़रहत'
रंग
और
रौशनी
भी
ज़ाइल
हैं
सिर्फ़
सहराओं
ही
की
बात
नहीं
बस्तियों
में
भी
तेरे
घाइल
हैं
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Farhat Abbas Shah
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