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Farhat Abbas Shah
kaha main kahaan ho tum
kaha main kahaan ho tum | कहा मैं कहाँ हो तुम
- Farhat Abbas Shah
कहा
मैं
कहाँ
हो
तुम
जवाब
आया
जहाँ
हो
तुम
मिरे
जीवन
से
ज़ाहिर
हो
मिरे
ग़म
में
निहाँ
हो
तुम
मिरी
तो
सारी
दुनिया
हो
मिरा
सारा
जहाँ
हो
तुम
मिरी
सोचों
के
मेहवर
हो
मिरा
ज़ोर-ए-बयाँ
हो
तुम
मैं
तो
लफ़्ज़-ए-मोहब्बत
हूँ
मगर
मेरी
ज़बाँ
हो
तुम
- Farhat Abbas Shah
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हिन्दी
में
और
उर्दू
में
फ़र्क़
है
तो
इतना
वो
ख़्वाब
देखते
हैं
हम
देखते
हैं
सपना
Unknown
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कोई
वा'दा
न
देंगे
दान
में
क्या
झूट
तक
अब
नहीं
ज़बान
में
क्या
Tufail chaturvedi
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तुम्हारा
नाम
जैसे
एक
मीठे
पान
का
बीड़ा
ज़बाँ
पे
रख
लिया
है
रूह
मेरी
सुर्ख़
है
तब
से
Umesh Maurya
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वो
नशा
है
के
ज़बाँ
अक़्ल
से
करती
है
फ़रेब
तू
मिरी
बात
के
मफ़्हूम
पे
जाता
है
कहाँ
Pallav Mishra
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नादानी
ये
ज़रा
सी
ले
ले
न
जान
मेरी
फूलों
से
भर
रखी
है
मैंने
मयान
मेरी
हैं
आपको
जो
शिकवे
मेरी
ज़बान
से
जाँ
तो
काट
लें
लबों
से
अपने
ज़बान
मेरी
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vivek sahu
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उस
साँवले
से
जिस्म
को
देखा
ही
था
कि
बस
घुलने
लगे
ज़बाँ
पे
मज़े
चाकलेट
के
Shahid Kabir
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मिल
गए
थे
एक
बार
उस
के
जो
मेरे
लब
से
लब
उम्र
भर
होंटों
पे
अपने
मैं
ज़बाँ
फेरा
किया
Jurat Qalandar Bakhsh
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तिरे
जमाल
की
तस्वीर
खींच
दूँ
लेकिन
ज़बाँ
में
आँख
नहीं
आँख
में
ज़बान
नहीं
Jigar Moradabadi
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क्या
ख़ूब
तुम
ने
ग़ैर
को
बोसा
नहीं
दिया
बस
चुप
रहो
हमारे
भी
मुँह
में
ज़बान
है
Mirza Ghalib
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हफ़ीज़'
अपनी
बोली
मोहब्बत
की
बोली
न
उर्दू
न
हिन्दी
न
हिन्दोस्तानी
Hafeez Jalandhari
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बस
एक
लम्हे
के
सच
झूट
के
एवज़
'फ़रहत'
तमाम
उम्र
का
इल्ज़ाम
ले
गया
मुझ
से
Farhat Abbas Shah
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कहीं
से
दुख
तो
कहीं
से
घुटन
उठा
लाए
कहाँ-कहाँ
से
न
दीवानापन
उठा
लाए
अजीब
ख़्वाब
था
देखा
के
दर-ब-दर
हो
कर
हम
अपने
मुल्क
से
अपना
वतन
उठा
लाए
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Farhat Abbas Shah
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ये
झाँक
लेती
है
दिल
से
जो
दूसरे
दिल
में
मेरी
निगाह
में
सारा
कमाल
दर्द
का
है
Farhat Abbas Shah
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दिल
भी
आवारा
नज़र
आवारा
कट
गया
सारा
सफ़र
आवारा
ज़िंदगी
भटका
हुआ
जंगल
है
राह
बेचैन
शजर
आवारा
रूह
की
खिड़की
से
हम
झाँकते
हैं
और
लगता
है
नगर
आवारा
तुझ
को
मा'लूम
कहाँ
होगा
कि
शब
कैसे
करते
हैं
बसर
आवारा
मुझ
को
मा'लूम
है
अपने
बारे
हूँ
बहुत
अच्छा
मगर
आवारा
ये
अलग
बात
कि
बस
पल-दो-पल
लौट
के
आते
हैं
घर
आवारा
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Farhat Abbas Shah
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आग
हो
तो
जलने
में
देर
कितनी
लगती
है
बर्फ
के
पिघलने
में
देर
कितनी
लगती
है
चाहे
कोई
रुक
जाए
चाहे
कोई
रह
जाए
काफिलो
को
चलने
में
देर
कितनी
लगती
है
चाहे
कोई
जैसा
भी
हम
सेफ़र
हो
सदियों
से
रास्ता
बदलने
में
देर
कितनी
लगती
है
ये
तो
वक़्त
के
बस
में
है
के
कितनी
मोहलत
दे
वरना
वक़्त
ढलने
में
देर
कितनी
लगती
है
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Farhat Abbas Shah
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