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Babar Rahman Shah
tum ko main jab salaam karta hooñ
tum ko main jab salaam karta hooñ | तुम को मैं जब सलाम करता हूँ
- Babar Rahman Shah
तुम
को
मैं
जब
सलाम
करता
हूँ
तब
फ़ुग़ाँ
गाम
गाम
करता
हूँ
ग़ुंचा-ओ-गुल
की
ख़स्ता-हाली
का
ज़िक्र
में
सुब्ह-ओ-शाम
करता
हूँ
बे-सुतूँ
काट
कर
खड़ा
हूँ
मैं
कोहकन
जैसे
काम
करता
हूँ
आतिश-ए-इश्क़
जब
जलाती
है
जल
के
मैं
नोश-ए-जाम
करता
हूँ
शे'र
होता
नहीं
है
जब
'बाबर'
उस
का
कुछ
एहतिमाम
करता
हूँ
- Babar Rahman Shah
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न
हारा
है
इश्क़
और
न
दुनिया
थकी
है
दिया
जल
रहा
है
हवा
चल
रही
है
Khumar Barabankvi
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तू
अपने
सारे
दुख
जाकर
बताता
है
जिन्हें,
इक
दिन
बढ़ाएँगे
वही
ग़म-ख़्वार
तेरी
आँख
का
पानी
Siddharth Saaz
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पेड़
के
काटने
वालों
को
ये
मालूम
तो
था
जिस्म
जल
जाएँगे
जब
सर
पे
न
साया
होगा
Kaifi Azmi
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रोते
बच्चे
पूछ
रहे
हैं
मम्मी
से
कितना
पानी
और
मिलाया
जाएगा
Divy Kamaldhwaj
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पुरानी
कश्ती
को
पार
लेकर
फ़क़त
हमारा
हुनर
गया
है
नए
खेवइये
कहीं
न
समझें
नदी
का
पानी
उतर
गया
है
Uday Pratap Singh
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हमारी
मुस्कुराहट
पर
न
जाना
दिया
तो
क़ब्र
पर
भी
जल
रहा
है
Aanis Moin
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ज़मीं
का
जल
कभी
बादल
रहा
है
तमाशा
ज़िन्दगी
का
चल
रहा
है
Umesh Maurya
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मिट्टी
और
पानी
भी
हमें
नाप
कर
मिलते
हैं
तुम
गमले
में
पालने
को
आसान
समझते
हो
Vishal Bagh
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क्या
कहा
दोस्त
समझना
है
तुम्हें
प्यार
नहीं
यानी
बस
देखना
है
पानी
को
पीना
नहीं
है
Neeraj Neer
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आँख
वो
इक
शहर
जिस
में
दम
घुटेगा
दिल
में
रहना
घर
में
रहने
की
तरह
है
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Neeraj Neer
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दास्तान-ए-ग़म
तुझे
बतलाएँ
क्या
ज़ख़्म
सीने
के
तुझे
दिखलाएँ
क्या
सोचते
हैं
भूल
जाएँ
सरज़निश
मुद्दतों
की
बात
अब
जतलाएँ
क्या
लोग
उस
की
बात
तो
सुनते
नहीं
ख़िज़्र
को
जंगल
से
हम
बुलवाएँ
क्या
रोज़
तुम
व'अदा
नया
ले
लेते
हो
पास
इन
वादों
का
हम
रख
पाएँ
क्या
मुफ़्लिसी
ने
जा-ब-जा
लूटा
हमें
अब
बचा
कुछ
भी
नहीं
लुटवाएँ
क्या
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Babar Rahman Shah
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दिल
ने
हम
से
अजब
ही
काम
लिया
हम
को
बेचा
मगर
न
दाम
लिया
दिल
से
आख़िर
चराग़-ए-वस्ल
बुझा
क्या
तमन्ना
ने
इंतिक़ाम
लिया
फिर
कभी
वो
न
आई
हम
को
नज़र
जिस
परी-रू
का
हम
ने
नाम
लिया
तेरी
ख़ातिर
हनूज़
हम
ने
यहाँ
लाख
इल्ज़ाम
अपने
नाम
लिया
ता-दम-ए-मर्ग
इश्क़
जीता
रहा
गोर
में
भी
मिरा
सलाम
लिया
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Babar Rahman Shah
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नहीं
नहीं
ये
मिरा
अक्स
हो
नहीं
सकता
किसी
के
सामने
में
यूँँ
तो
रो
नहीं
सकता
थकन
से
चूर
है
सारा
वजूद
अब
मेरा
मैं
बोझ
इतने
ग़मों
का
तो
ढो
नहीं
सकता
तुझे
ग़ज़ल
तो
सुनाता
हूँ
आज
'बाबर'
की
मगर
मैं
अश्कों
से
दामन
भिगो
नहीं
सकता
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Babar Rahman Shah
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किसी
के
जाल
में
आ
कर
मैं
अपना
दिल
गँवा
बैठा
मुझे
था
इश्क़
क़ातिल
से
मैं
अपना
सर
कटा
बैठा
ग़ज़ब
का
संग-दिल
आग़ाज़
से
ही
बे-मुरव्वत
था
कि
जिस
से
दूर
रहना
था
मैं
उस
के
पास
जा
बैठा
मिरा
माबूद
तो
इश्क़-ए-बुताँ
से
लाख
अफ़ज़ल
था
मुझे
किस
से
लगाना
था
मैं
दिल
किस
से
लगा
बैठा
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Babar Rahman Shah
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मान
लो
साहिबो
कहा
मेरा
क्यूँँ
कि
इबरत
है
नक़्श-ए-पा
मेरा
है
तमन्ना
में
ग़ारत
ओ
रुस्वा
शे'र
मेरा,
किताबचा
मेरा
ऐ
परी-ज़ाद
तेरे
जाने
पर
हो
गया
ख़ुद
से
राब्ता
मेरा
जंगलों
से
मुझे
ये
निस्बत
है
इन
में
रहता
था
आश्ना
मेरा
आम
सा
आदमी
हूँ
मैं
साहिब
शे'र
होता
है
आम
सा
मेरा
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Babar Rahman Shah
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