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Kaifi Azmi
ped ke kaatne waalon ko ye maaloom to tha
ped ke kaatne waalon ko ye maaloom to tha | पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था
- Kaifi Azmi
पेड़
के
काटने
वालों
को
ये
मालूम
तो
था
जिस्म
जल
जाएँगे
जब
सर
पे
न
साया
होगा
- Kaifi Azmi
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तमाम
जिस्म
को
आँखें
बना
के
राह
तको
तमाम
खेल
मुहब्बत
में
इंतिज़ार
का
है
Munawwar Rana
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वक़्त-ए-रुख़्सत
आब-दीदा
आप
क्यूँँ
हैं
जिस्म
से
तो
जाँ
हमारी
जा
रही
है
Azm Shakri
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हुस्न
जब
मेहरबाँ
हो
तो
क्या
कीजिए
इश्क़
के
मग़्फ़िरत
की
दु'आ
कीजिए
Khumar Barabankvi
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जिस्म
के
पार
जाना
पड़ा
था
कभी
इश्क़
कर
के
हुई
बंदगी
की
समझ
Neeraj Neer
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इसीलिए
तो
हिफ़ाज़त
में
बैठा
रहता
हूँ
मेरे
बदन
में
कोई
नीम
जान
रहता
है
Nirmal Nadeem
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बारिशें
जाड़े
की
और
तन्हा
बहुत
मेरा
किसान
जिस्म
और
इकलौता
कंबल
भीगता
है
साथ-साथ
Parveen Shakir
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उस
के
फ़रोग़-ए-हुस्न
से
झमके
है
सब
में
नूर
शम-ए-हरम
हो
या
हो
दिया
सोमनात
का
Meer Taqi Meer
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अब
सुलगती
है
हथेली
तो
ख़याल
आता
है
वो
बदन
सिर्फ़
निहारा
भी
तो
जा
सकता
था
Ameer Imam
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इसी
कारण
से
मैं
उसका
बदन
छूता
नहीं
यारों
मुझे
मालूम
है
क़िस्मत
में
वो
लिक्खा
नहीं
यारों
Harsh saxena
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आँसुओं
में
मिरे
काँधे
को
डुबोने
वाले
पूछ
तो
ले
कि
मिरे
जिस्म
का
सहरा
है
कहाँ
Pallav Mishra
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तुम
इतना
जो
मुस्कुरा
रहे
हो
क्या
ग़म
है
जिस
को
छुपा
रहे
हो
आँखों
में
नमी
हँसी
लबों
पर
क्या
हाल
है
क्या
दिखा
रहे
हो
बन
जाएँगे
ज़हर
पीते
पीते
ये
अश्क
जो
पीते
जा
रहे
हो
जिन
ज़ख़्मों
को
वक़्त
भर
चला
है
तुम
क्यूँँ
उन्हें
छेड़े
जा
रहे
हो
रेखाओं
का
खेल
है
मुक़द्दर
रेखाओं
से
मात
खा
रहे
हो
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Kaifi Azmi
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ग़ुर्बत
की
ठंडी
छाँव
में
याद
आई
उस
की
धूप
क़द्र-ए-वतन
हुई
हमें
तर्क-ए-वतन
के
बाद
Kaifi Azmi
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पत्थर
के
ख़ुदा
वहाँ
भी
पाए
हम
चाँद
से
आज
लौट
आए
दीवारें
तो
हर
तरफ़
खड़ी
हैं
क्या
हो
गए
मेहरबान
साए
जंगल
की
हवाएँ
आ
रही
हैं
काग़ज़
का
ये
शहर
उड़
न
जाए
लैला
ने
नया
जनम
लिया
है
है
क़ैस
कोई
जो
दिल
लगाए
है
आज
ज़मीं
का
ग़ुस्ल-ए-सेह्हत
जिस
दिल
में
हो
जितना
ख़ून
लाए
सहरा
सहरा
लहू
के
खे़
में
फिर
प्यासे
लब-ए-फ़ुरात
आए
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Kaifi Azmi
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बस
इक
झिजक
है
यही
हाल-ए-दिल
सुनाने
में
कि
तेरा
ज़िक्र
भी
आएगा
इस
फ़साने
में
Kaifi Azmi
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गर
डूबना
ही
अपना
मुक़द्दर
है
तो
सुनो
डूबेंगे
हम
ज़रूर
मगर
नाख़ुदा
के
साथ
Kaifi Azmi
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