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Babar Rahman Shah
maan lo saahibo kaha meraa
maan lo saahibo kaha meraa | मान लो साहिबो कहा मेरा
- Babar Rahman Shah
मान
लो
साहिबो
कहा
मेरा
क्यूँँ
कि
इबरत
है
नक़्श-ए-पा
मेरा
है
तमन्ना
में
ग़ारत
ओ
रुस्वा
शे'र
मेरा,
किताबचा
मेरा
ऐ
परी-ज़ाद
तेरे
जाने
पर
हो
गया
ख़ुद
से
राब्ता
मेरा
जंगलों
से
मुझे
ये
निस्बत
है
इन
में
रहता
था
आश्ना
मेरा
आम
सा
आदमी
हूँ
मैं
साहिब
शे'र
होता
है
आम
सा
मेरा
- Babar Rahman Shah
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समझ
से
काम
जो
लेता
हर
एक
बशर
'ताबाँ'
न
हाहा-कार
ही
मचते
न
घर
जला
करते
Anwar Taban
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मैं
चीख़ता
रहा
कुछ
और
भी
है
मेरा
इलाज
मगर
ये
लोग
तुम्हारा
ही
नाम
लेते
रहे
Anjum Saleemi
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इश्क़
जब
तक
न
कर
चुके
रुस्वा
आदमी
काम
का
नहीं
होता
Jigar Moradabadi
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मिरी
ज़बान
के
मौसम
बदलते
रहते
हैं
मैं
आदमी
हूँ
मिरा
ए'तिबार
मत
करना
Asim Wasti
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जुदा
हुए
हैं
बहुत
लोग
एक
तुम
भी
सही
अब
इतनी
बात
पे
क्या
ज़िंदगी
हराम
करें
Nasir Kazmi
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क्या
लोग
हैं
कि
दिल
की
गिरह
खोलते
नहीं
आँखों
से
देखते
हैं
मगर
बोलते
नहीं
Akhtar Hoshiyarpuri
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अच्छों
से
पता
चलता
है
इंसाँ
को
बुरों
का
रावन
का
पता
चल
न
सका
राम
से
पहले
Rizwan Banarasi
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ये
लोग
कौन
हैं
आख़िर
कहाँ
से
आते
हैं
जो
जिस्म
नोच
के
फिर
बेटियाँ
जलाते
हैं
Shajar Abbas
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हम
लोग
चूंकि
दश्त
के
पाले
हुए
हैं
सो
ख़्वाबों
में
चाहे
झील
हों,
आँखों
में
पेड़
हैं
Siddharth Saaz
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ठहाका
मार
कर
हथियार
हँसते
नहीं
जीतेंगे
अब
इंसान
हम
सेे
Umesh Maurya
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दिल
ने
हम
से
अजब
ही
काम
लिया
हम
को
बेचा
मगर
न
दाम
लिया
दिल
से
आख़िर
चराग़-ए-वस्ल
बुझा
क्या
तमन्ना
ने
इंतिक़ाम
लिया
फिर
कभी
वो
न
आई
हम
को
नज़र
जिस
परी-रू
का
हम
ने
नाम
लिया
तेरी
ख़ातिर
हनूज़
हम
ने
यहाँ
लाख
इल्ज़ाम
अपने
नाम
लिया
ता-दम-ए-मर्ग
इश्क़
जीता
रहा
गोर
में
भी
मिरा
सलाम
लिया
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Babar Rahman Shah
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नहीं
नहीं
ये
मिरा
अक्स
हो
नहीं
सकता
किसी
के
सामने
में
यूँँ
तो
रो
नहीं
सकता
थकन
से
चूर
है
सारा
वजूद
अब
मेरा
मैं
बोझ
इतने
ग़मों
का
तो
ढो
नहीं
सकता
तुझे
ग़ज़ल
तो
सुनाता
हूँ
आज
'बाबर'
की
मगर
मैं
अश्कों
से
दामन
भिगो
नहीं
सकता
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Babar Rahman Shah
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किसी
के
जाल
में
आ
कर
मैं
अपना
दिल
गँवा
बैठा
मुझे
था
इश्क़
क़ातिल
से
मैं
अपना
सर
कटा
बैठा
ग़ज़ब
का
संग-दिल
आग़ाज़
से
ही
बे-मुरव्वत
था
कि
जिस
से
दूर
रहना
था
मैं
उस
के
पास
जा
बैठा
मिरा
माबूद
तो
इश्क़-ए-बुताँ
से
लाख
अफ़ज़ल
था
मुझे
किस
से
लगाना
था
मैं
दिल
किस
से
लगा
बैठा
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Babar Rahman Shah
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तुम
को
मैं
जब
सलाम
करता
हूँ
तब
फ़ुग़ाँ
गाम
गाम
करता
हूँ
ग़ुंचा-ओ-गुल
की
ख़स्ता-हाली
का
ज़िक्र
में
सुब्ह-ओ-शाम
करता
हूँ
बे-सुतूँ
काट
कर
खड़ा
हूँ
मैं
कोहकन
जैसे
काम
करता
हूँ
आतिश-ए-इश्क़
जब
जलाती
है
जल
के
मैं
नोश-ए-जाम
करता
हूँ
शे'र
होता
नहीं
है
जब
'बाबर'
उस
का
कुछ
एहतिमाम
करता
हूँ
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Babar Rahman Shah
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दास्तान-ए-ग़म
तुझे
बतलाएँ
क्या
ज़ख़्म
सीने
के
तुझे
दिखलाएँ
क्या
सोचते
हैं
भूल
जाएँ
सरज़निश
मुद्दतों
की
बात
अब
जतलाएँ
क्या
लोग
उस
की
बात
तो
सुनते
नहीं
ख़िज़्र
को
जंगल
से
हम
बुलवाएँ
क्या
रोज़
तुम
व'अदा
नया
ले
लेते
हो
पास
इन
वादों
का
हम
रख
पाएँ
क्या
मुफ़्लिसी
ने
जा-ब-जा
लूटा
हमें
अब
बचा
कुछ
भी
नहीं
लुटवाएँ
क्या
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Babar Rahman Shah
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