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Babar Rahman Shah
dil ne ham se ajab hi kaam liya
dil ne ham se ajab hi kaam liya | दिल ने हम से अजब ही काम लिया
- Babar Rahman Shah
दिल
ने
हम
से
अजब
ही
काम
लिया
हम
को
बेचा
मगर
न
दाम
लिया
दिल
से
आख़िर
चराग़-ए-वस्ल
बुझा
क्या
तमन्ना
ने
इंतिक़ाम
लिया
फिर
कभी
वो
न
आई
हम
को
नज़र
जिस
परी-रू
का
हम
ने
नाम
लिया
तेरी
ख़ातिर
हनूज़
हम
ने
यहाँ
लाख
इल्ज़ाम
अपने
नाम
लिया
ता-दम-ए-मर्ग
इश्क़
जीता
रहा
गोर
में
भी
मिरा
सलाम
लिया
- Babar Rahman Shah
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बोसा
देते
नहीं
और
दिल
पे
है
हर
लहज़ा
निगाह
जी
में
कहते
हैं
कि
मुफ़्त
आए
तो
माल
अच्छा
है
Mirza Ghalib
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वो
दिल-नवाज़
है
लेकिन
नज़र-शनास
नहीं
मिरा
इलाज
मिरे
चारा-गर
के
पास
नहीं
Nasir Kazmi
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तुझ
तक
आने
का
सफ़र
इतना
भी
आसाँ
तो
न
था
तूने
फेरी
है
नज़र
हम
सेे
जिस
आसानी
से
Mohit Dixit
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सब
लोग
जिधर
वो
हैं
उधर
देख
रहे
हैं
हम
देखने
वालों
की
नज़र
देख
रहे
हैं
Dagh Dehlvi
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पहले
डाली
तेरे
चेहरे
पे
बहुत
देर
नज़र
ईद
का
चाँद
तो
फिर
बाद
में
देखा
मैंने
Vijendra Singh Parwaaz
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फिर
नज़र
में
फूल
महके
दिल
में
फिर
शमएँ
जलीं
फिर
तसव्वुर
ने
लिया
उस
बज़्म
में
जाने
का
नाम
Faiz Ahmad Faiz
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मुद्दत
के
बाद
उस
ने
जो
की
लुत्फ़
की
निगाह
जी
ख़ुश
तो
हो
गया
मगर
आँसू
निकल
पड़े
Kaifi Azmi
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सखी
को
हमारी
नज़र
लग
न
जाए
उसे
ख़्वाब
में
रात
भर
देखते
हैं
Sahil Verma
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देखो
तो
चश्म-ए-यार
की
जादू-निगाहियाँ
बेहोश
इक
नज़र
में
हुई
अंजुमन
तमाम
Hasrat Mohani
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तुम्हारी
राह
में
मिट्टी
के
घर
नहीं
आते
इसलिए
तो
तुम्हें
हम
नज़र
नहीं
आते
Waseem Barelvi
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किसी
के
जाल
में
आ
कर
मैं
अपना
दिल
गँवा
बैठा
मुझे
था
इश्क़
क़ातिल
से
मैं
अपना
सर
कटा
बैठा
ग़ज़ब
का
संग-दिल
आग़ाज़
से
ही
बे-मुरव्वत
था
कि
जिस
से
दूर
रहना
था
मैं
उस
के
पास
जा
बैठा
मिरा
माबूद
तो
इश्क़-ए-बुताँ
से
लाख
अफ़ज़ल
था
मुझे
किस
से
लगाना
था
मैं
दिल
किस
से
लगा
बैठा
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Babar Rahman Shah
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मान
लो
साहिबो
कहा
मेरा
क्यूँँ
कि
इबरत
है
नक़्श-ए-पा
मेरा
है
तमन्ना
में
ग़ारत
ओ
रुस्वा
शे'र
मेरा,
किताबचा
मेरा
ऐ
परी-ज़ाद
तेरे
जाने
पर
हो
गया
ख़ुद
से
राब्ता
मेरा
जंगलों
से
मुझे
ये
निस्बत
है
इन
में
रहता
था
आश्ना
मेरा
आम
सा
आदमी
हूँ
मैं
साहिब
शे'र
होता
है
आम
सा
मेरा
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Babar Rahman Shah
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दास्तान-ए-ग़म
तुझे
बतलाएँ
क्या
ज़ख़्म
सीने
के
तुझे
दिखलाएँ
क्या
सोचते
हैं
भूल
जाएँ
सरज़निश
मुद्दतों
की
बात
अब
जतलाएँ
क्या
लोग
उस
की
बात
तो
सुनते
नहीं
ख़िज़्र
को
जंगल
से
हम
बुलवाएँ
क्या
रोज़
तुम
व'अदा
नया
ले
लेते
हो
पास
इन
वादों
का
हम
रख
पाएँ
क्या
मुफ़्लिसी
ने
जा-ब-जा
लूटा
हमें
अब
बचा
कुछ
भी
नहीं
लुटवाएँ
क्या
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Babar Rahman Shah
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तुम
को
मैं
जब
सलाम
करता
हूँ
तब
फ़ुग़ाँ
गाम
गाम
करता
हूँ
ग़ुंचा-ओ-गुल
की
ख़स्ता-हाली
का
ज़िक्र
में
सुब्ह-ओ-शाम
करता
हूँ
बे-सुतूँ
काट
कर
खड़ा
हूँ
मैं
कोहकन
जैसे
काम
करता
हूँ
आतिश-ए-इश्क़
जब
जलाती
है
जल
के
मैं
नोश-ए-जाम
करता
हूँ
शे'र
होता
नहीं
है
जब
'बाबर'
उस
का
कुछ
एहतिमाम
करता
हूँ
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Babar Rahman Shah
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नहीं
नहीं
ये
मिरा
अक्स
हो
नहीं
सकता
किसी
के
सामने
में
यूँँ
तो
रो
नहीं
सकता
थकन
से
चूर
है
सारा
वजूद
अब
मेरा
मैं
बोझ
इतने
ग़मों
का
तो
ढो
नहीं
सकता
तुझे
ग़ज़ल
तो
सुनाता
हूँ
आज
'बाबर'
की
मगर
मैं
अश्कों
से
दामन
भिगो
नहीं
सकता
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Babar Rahman Shah
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