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Babar Rahman Shah
nahin nahin ye miraa aks ho nahin saka
nahin nahin ye miraa aks ho nahin saka | नहीं नहीं ये मिरा अक्स हो नहीं सकता
- Babar Rahman Shah
नहीं
नहीं
ये
मिरा
अक्स
हो
नहीं
सकता
किसी
के
सामने
में
यूँँ
तो
रो
नहीं
सकता
थकन
से
चूर
है
सारा
वजूद
अब
मेरा
मैं
बोझ
इतने
ग़मों
का
तो
ढो
नहीं
सकता
तुझे
ग़ज़ल
तो
सुनाता
हूँ
आज
'बाबर'
की
मगर
मैं
अश्कों
से
दामन
भिगो
नहीं
सकता
- Babar Rahman Shah
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मेहरबाँ
हम
पे
हर
इक
रात
हुआ
करती
थी
आँख
लगते
ही
मुलाक़ात
हुआ
करती
थी
हिज्र
की
रात
है
और
आँख
में
आँसू
भी
नहीं
ऐसे
मौसम
में
तो
बरसात
हुआ
करती
थी
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Ismail Raaz
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आँसू
हमारे
गिर
गए
उन
की
निगाह
से
इन
मोतियों
की
अब
कोई
क़ीमत
नहीं
रही
Jaleel Manikpuri
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माँ
के
आँसू
को
समझता
हूँ
मुक़द्दस
इतना
बस
उन्हें
चूम
ले
अफ़ज़ल
तो
वज़ू
हो
जाए
S M Afzal Imam
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न
खाओ
क़स
में
वग़ैरा
न
अश्क
ज़ाया'
करो
तुम्हें
पता
है
मेरी
जान
हक़-पज़ीर
हूँ
मैं
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Amaan Haider
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मोहब्बत
में
इक
ऐसा
वक़्त
भी
दिल
पर
गुज़रता
है
कि
आँसू
ख़ुश्क
हो
जाते
हैं
तुग़्यानी
नहीं
जाती
Jigar Moradabadi
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सारे
आँसू
तुझ
पर
ज़ाया'
क्यूँँ
कर
दें
हमनें
तेरे
बाद
भी
दिलबर
करने
हैं
Shikha Pachouly
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इस
बार
अश्क
कर
चुके
क़ीमत
अदायगी
इस
बार
तेरा
जाना
भी
ज़ाया'
नहीं
लगा
Aqib khan
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हम
कुछ
ऐसे
उसके
आगे
अपनी
वफ़ा
रख
देते
हैं
बच्चे
जैसे
रेल
की
पटरी
पर
सिक्का
रख
देते
हैं
तस्वीर-ए-ग़म,
दिल
के
आँसू,
रंजो-नदामत,
तन्हाई
उसको
ख़त
लिखते
हैं
ख़त
में
हम
क्या
क्या
रख
देते
हैं
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Subhan Asad
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कुछ
ख़ुशियाँ
कुछ
आँसू
दे
कर
टाल
गया
जीवन
का
इक
और
सुनहरा
साल
गया
Unknown
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पत्थर
दिल
के
आँसू
ऐसे
बहते
हैं
जैसे
इक
पर्वत
से
नदी
निकलती
है
Shobhit Dixit
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मान
लो
साहिबो
कहा
मेरा
क्यूँँ
कि
इबरत
है
नक़्श-ए-पा
मेरा
है
तमन्ना
में
ग़ारत
ओ
रुस्वा
शे'र
मेरा,
किताबचा
मेरा
ऐ
परी-ज़ाद
तेरे
जाने
पर
हो
गया
ख़ुद
से
राब्ता
मेरा
जंगलों
से
मुझे
ये
निस्बत
है
इन
में
रहता
था
आश्ना
मेरा
आम
सा
आदमी
हूँ
मैं
साहिब
शे'र
होता
है
आम
सा
मेरा
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Babar Rahman Shah
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दिल
ने
हम
से
अजब
ही
काम
लिया
हम
को
बेचा
मगर
न
दाम
लिया
दिल
से
आख़िर
चराग़-ए-वस्ल
बुझा
क्या
तमन्ना
ने
इंतिक़ाम
लिया
फिर
कभी
वो
न
आई
हम
को
नज़र
जिस
परी-रू
का
हम
ने
नाम
लिया
तेरी
ख़ातिर
हनूज़
हम
ने
यहाँ
लाख
इल्ज़ाम
अपने
नाम
लिया
ता-दम-ए-मर्ग
इश्क़
जीता
रहा
गोर
में
भी
मिरा
सलाम
लिया
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Babar Rahman Shah
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किसी
के
जाल
में
आ
कर
मैं
अपना
दिल
गँवा
बैठा
मुझे
था
इश्क़
क़ातिल
से
मैं
अपना
सर
कटा
बैठा
ग़ज़ब
का
संग-दिल
आग़ाज़
से
ही
बे-मुरव्वत
था
कि
जिस
से
दूर
रहना
था
मैं
उस
के
पास
जा
बैठा
मिरा
माबूद
तो
इश्क़-ए-बुताँ
से
लाख
अफ़ज़ल
था
मुझे
किस
से
लगाना
था
मैं
दिल
किस
से
लगा
बैठा
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Babar Rahman Shah
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तुम
को
मैं
जब
सलाम
करता
हूँ
तब
फ़ुग़ाँ
गाम
गाम
करता
हूँ
ग़ुंचा-ओ-गुल
की
ख़स्ता-हाली
का
ज़िक्र
में
सुब्ह-ओ-शाम
करता
हूँ
बे-सुतूँ
काट
कर
खड़ा
हूँ
मैं
कोहकन
जैसे
काम
करता
हूँ
आतिश-ए-इश्क़
जब
जलाती
है
जल
के
मैं
नोश-ए-जाम
करता
हूँ
शे'र
होता
नहीं
है
जब
'बाबर'
उस
का
कुछ
एहतिमाम
करता
हूँ
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Babar Rahman Shah
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दास्तान-ए-ग़म
तुझे
बतलाएँ
क्या
ज़ख़्म
सीने
के
तुझे
दिखलाएँ
क्या
सोचते
हैं
भूल
जाएँ
सरज़निश
मुद्दतों
की
बात
अब
जतलाएँ
क्या
लोग
उस
की
बात
तो
सुनते
नहीं
ख़िज़्र
को
जंगल
से
हम
बुलवाएँ
क्या
रोज़
तुम
व'अदा
नया
ले
लेते
हो
पास
इन
वादों
का
हम
रख
पाएँ
क्या
मुफ़्लिसी
ने
जा-ब-जा
लूटा
हमें
अब
बचा
कुछ
भी
नहीं
लुटवाएँ
क्या
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Babar Rahman Shah
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