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Babar Rahman Shah
kisi ke jaal men aa kar main apna dil ganwa baitha
kisi ke jaal men aa kar main apna dil ganwa baitha | किसी के जाल में आ कर मैं अपना दिल गँवा बैठा
- Babar Rahman Shah
किसी
के
जाल
में
आ
कर
मैं
अपना
दिल
गँवा
बैठा
मुझे
था
इश्क़
क़ातिल
से
मैं
अपना
सर
कटा
बैठा
ग़ज़ब
का
संग-दिल
आग़ाज़
से
ही
बे-मुरव्वत
था
कि
जिस
से
दूर
रहना
था
मैं
उस
के
पास
जा
बैठा
मिरा
माबूद
तो
इश्क़-ए-बुताँ
से
लाख
अफ़ज़ल
था
मुझे
किस
से
लगाना
था
मैं
दिल
किस
से
लगा
बैठा
- Babar Rahman Shah
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मैं
चाहता
हूँ
मोहब्बत
मेरा
वो
हाल
करे
कि
ख़्वाब
में
भी
दोबारा
कभी
मजाल
न
हो
Jawwad Sheikh
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'असद'
ये
शर्त
नहीं
है
कोई
मुहब्बत
में
कि
जिस
सेे
प्यार
करो
उसकी
आरज़ू
भी
करो
Subhan Asad
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इक
और
इश्क़
की
नहीं
फुर्सत
मुझे
सनम
और
हो
भी
अब
अगर
तो
मेरा
मन
नहीं
बचा
Afzal Ali Afzal
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नई
नस्लें
समझ
पाएँ
मुहब्बत
के
मआनी
हमें
इस
वास्ते
भी
शा'इरी
करनी
पड़ेगी
Dipendra Singh 'Raaz'
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वो
जो
पहला
था
अपना
इश्क़
वही
आख़िरी
वारदात
थी
दिल
की
Pooja Bhatia
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जँचने
लगा
है
दर्द
मुझे
आपका
दिया
बर्बाद
करने
वाले
ने
ही
आसरा
दिया
कल
पहली
बार
लड़ने
की
हिम्मत
नहीं
हुई
मुझको
किसी
के
प्यार
ने
बुजदिल
बना
दिया
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Kushal Dauneria
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ज़रूरत
सब
कराती
है
मोहब्बत
भी
इबादत
भी
नहीं
तो
कौन
बेमतलब
किसी
को
याद
करता
है
Umesh Maurya
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सँभलने
के
लिए
कर
ली
मुहब्बत
मगर
इस
में
फिसलना
चाहिए
था
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Divy Kamaldhwaj
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मेरा
किरदार
मेरी
बात
कहाँ
सुनता
है
ये
समझदार
मेरी
बात
कहाँ
सुनता
है
इश्क़
है
वादा-फ़रामोश
नहीं
है
कोई
दिल
तलबगार
मेरी
बात
कहाँ
सुनता
है
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Vishal Singh Tabish
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कितना
झूठा
था
अपना
सच्चा
इश्क़
हिज्र
से
दोनों
ज़िंदा
बच
निकले
Prit
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मान
लो
साहिबो
कहा
मेरा
क्यूँँ
कि
इबरत
है
नक़्श-ए-पा
मेरा
है
तमन्ना
में
ग़ारत
ओ
रुस्वा
शे'र
मेरा,
किताबचा
मेरा
ऐ
परी-ज़ाद
तेरे
जाने
पर
हो
गया
ख़ुद
से
राब्ता
मेरा
जंगलों
से
मुझे
ये
निस्बत
है
इन
में
रहता
था
आश्ना
मेरा
आम
सा
आदमी
हूँ
मैं
साहिब
शे'र
होता
है
आम
सा
मेरा
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Babar Rahman Shah
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नहीं
नहीं
ये
मिरा
अक्स
हो
नहीं
सकता
किसी
के
सामने
में
यूँँ
तो
रो
नहीं
सकता
थकन
से
चूर
है
सारा
वजूद
अब
मेरा
मैं
बोझ
इतने
ग़मों
का
तो
ढो
नहीं
सकता
तुझे
ग़ज़ल
तो
सुनाता
हूँ
आज
'बाबर'
की
मगर
मैं
अश्कों
से
दामन
भिगो
नहीं
सकता
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Babar Rahman Shah
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दास्तान-ए-ग़म
तुझे
बतलाएँ
क्या
ज़ख़्म
सीने
के
तुझे
दिखलाएँ
क्या
सोचते
हैं
भूल
जाएँ
सरज़निश
मुद्दतों
की
बात
अब
जतलाएँ
क्या
लोग
उस
की
बात
तो
सुनते
नहीं
ख़िज़्र
को
जंगल
से
हम
बुलवाएँ
क्या
रोज़
तुम
व'अदा
नया
ले
लेते
हो
पास
इन
वादों
का
हम
रख
पाएँ
क्या
मुफ़्लिसी
ने
जा-ब-जा
लूटा
हमें
अब
बचा
कुछ
भी
नहीं
लुटवाएँ
क्या
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Babar Rahman Shah
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दिल
ने
हम
से
अजब
ही
काम
लिया
हम
को
बेचा
मगर
न
दाम
लिया
दिल
से
आख़िर
चराग़-ए-वस्ल
बुझा
क्या
तमन्ना
ने
इंतिक़ाम
लिया
फिर
कभी
वो
न
आई
हम
को
नज़र
जिस
परी-रू
का
हम
ने
नाम
लिया
तेरी
ख़ातिर
हनूज़
हम
ने
यहाँ
लाख
इल्ज़ाम
अपने
नाम
लिया
ता-दम-ए-मर्ग
इश्क़
जीता
रहा
गोर
में
भी
मिरा
सलाम
लिया
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Babar Rahman Shah
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तुम
को
मैं
जब
सलाम
करता
हूँ
तब
फ़ुग़ाँ
गाम
गाम
करता
हूँ
ग़ुंचा-ओ-गुल
की
ख़स्ता-हाली
का
ज़िक्र
में
सुब्ह-ओ-शाम
करता
हूँ
बे-सुतूँ
काट
कर
खड़ा
हूँ
मैं
कोहकन
जैसे
काम
करता
हूँ
आतिश-ए-इश्क़
जब
जलाती
है
जल
के
मैं
नोश-ए-जाम
करता
हूँ
शे'र
होता
नहीं
है
जब
'बाबर'
उस
का
कुछ
एहतिमाम
करता
हूँ
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Babar Rahman Shah
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