gham ka gumaan yaqeen-e-tarab se badal gaya | ग़म का गुमाँ यक़ीन-ए-तरब से बदल गया

  - Ali Manzoor Hyderabadi
ग़मकागुमाँयक़ीन-ए-तरबसेबदलगया
एहसास-ए-इश्क़हुस्नकेसाँचेमेंढलगया
साथउनकेलेरहाहूँमैंगुल-गश्तकेमज़े
येख़्वाबहीसहीमिराजीतोबहलगया
मजबूर-ए-इश्क़चश्म-ए-फ़ुसूँ-साज़सेहूँमैं
जादूमुझीपेदोस्तकाचलनाथाचलगया
मैंइंतिज़ार-ए-ईदमेंथाईदगई
अरमान-ए-दीददामन-ए-इशरतमेंपलगया
हैबर्क़-ए-जल्वायादमगरयेनहींहैयाद
ख़िरमनमिरेग़ुरूरकाकिसवक़्तजलगया
पैमान-ए-इश्क़-ओ-हुस्नकीतज्दीदकेसिवा
जोभीख़यालज़ेहनमेंआयानिकलगया
बढ़तेचलेहैंआएदिनअस्बाब-ए-इज़्तिराब
यादश-ब-ख़ैरआजकावा'दाभीटलगया
'मंज़ूर'किसज़बाँसेबुतोंकोबुराकहें
ईमाँहमाराकुफ़्रकेदामनमेंपलगया
  - Ali Manzoor Hyderabadi
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