masafat-e-shab-e-hijraan taveel likhte rahe | मसाफ़त-ए-शब-ए-हिज्राँ तवील लिखते रहे

  - Ahmad Fakhir
मसाफ़त-ए-शब-ए-हिज्राँतवीललिखतेरहे
मिलेजोदर्दउन्हेंसंग-ए-मीललिखतेरहे
हिकायतेंहीनहींलिक्खींआगकीहमने
हक़ीक़तेंभीब-रंग-ए-ख़लीललिखतेरहे
जोक़ल्ब-ओ-जाँमेंहैख़ुश्बूकिसीकीज़ुल्फ़ोंकी
उसीकोअपनीमता-ए-जलीललिखतेरहे
रहीयेआसकिसैराबहोगीकिश्त-ए-हयात
सोजौहड़ोंकोभीदरिया-ए-नीललिखतेरहे
निकलसकीवहाँएकबूँदभी'फ़ाख़िर'
तमाम-उम्रजिनआँखोंकोझीललिखतेरहे
  - Ahmad Fakhir
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