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Sahir Ludhianvi
ye zulf agar khul ke bikhar jaa.e to achha
ye zulf agar khul ke bikhar jaa.e to achha | ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा
- Sahir Ludhianvi
ये
ज़ुल्फ़
अगर
खुल
के
बिखर
जाए
तो
अच्छा
इस
रात
की
तक़दीर
सँवर
जाए
तो
अच्छा
जिस
तरह
से
थोड़ी
सी
तेरे
साथ
कटी
है
बाक़ी
भी
उसी
तरह
गुज़र
जाए
तो
अच्छा
- Sahir Ludhianvi
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सुन
कर
तमाम
रात
मेरी
दास्तान-ए-ग़म
बोले
तो
सिर्फ़
ये
कि
बहुत
बोलते
हो
तुम
Firaq Gorakhpuri
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मैं
सो
रहा
हूँ
तेरे
ख़्वाब
देखने
के
लिए
ये
आरज़ू
है
कि
आँखों
में
रात
रह
जाए
Shakeel Azmi
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चमेली
रात
कह
रही
थी
मेरी
बू
लिया
करें
और
इस
सेे
जी
नहीं
भरे
तो
मुझको
छू
लिया
करें
कभी
भी
अच्छे
देवता
नहीं
बनेंगे
ऐसे
आप
चढ़ावे
में
रुपए
नहीं
फ़क़त
लहू
लिया
करें
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Azbar Safeer
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ईद
के
रोज़
यही
अपनी
दु'आ
है
रब
से
मुल्क
में
अमन
का,
उलफ़त
का
बसेरा
हो
जाए
हर
परेशानी
से
हर
शख़्स
को
मिल
जाए
नजात
इस
सियह
रात
का
बस
जल्द
सवेरा
हो
जाए
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Zaki Azmi
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कल
चौदहवीं
की
रात
थी
शब
भर
रहा
चर्चा
तिरा
कुछ
ने
कहा
ये
चाँद
है
कुछ
ने
कहा
चेहरा
तिरा
Ibn E Insha
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इन्हीं
ग़म
की
घटाओं
से
ख़ुशी
का
चाँद
निकलेगा
अँधेरी
रात
के
पर्दे
में
दिन
की
रौशनी
भी
है
Akhtar Shirani
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मेहरबाँ
हम
पे
हर
इक
रात
हुआ
करती
थी
आँख
लगते
ही
मुलाक़ात
हुआ
करती
थी
हिज्र
की
रात
है
और
आँख
में
आँसू
भी
नहीं
ऐसे
मौसम
में
तो
बरसात
हुआ
करती
थी
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Ismail Raaz
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कहाँ
है
तू
कि
तिरे
इंतिज़ार
में
ऐ
दोस्त
तमाम
रात
सुलगते
हैं
दिल
के
वीराने
Nasir Kazmi
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जब
चाहें
सो
जाते
थे
हम,
तुम
सेे
बातें
करके
तब
उल्टी
गिनती
गिनने
से
भी
नींद
नहीं
आती
है
अब
इश्क़
मुहब्बत
पर
ग़ालिब
के
शे'र
सुनाए
उसको
जब
पहले
थोड़ा
शरमाई
वो
फिर
बोली
इसका
मतलब?
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Tanoj Dadhich
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तुम्हारा
ख़्वाब
भी
आए
तो
नींद
पूरी
हो
मैं
सो
तो
जाऊँगा
नींद
आने
की
दवा
लेकर
Swapnil Tiwari
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कौन
रोता
है
किसी
और
की
ख़ातिर
ऐ
दोस्त
सब
को
अपनी
ही
किसी
बात
पे
रोना
आया
Sahir Ludhianvi
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दूर
रह
कर
न
करो
बात
क़रीब
आ
जाओ
याद
रह
जाएगी
ये
रात
क़रीब
आ
जाओ
एक
मुद्दत
से
तमन्ना
थी
तुम्हें
छूने
की
आज
बस
में
नहीं
जज़्बात
क़रीब
आ
जाओ
सर्द
झोंकों
से
भड़कते
हैं
बदन
में
शोले
जान
ले
लेगी
ये
बरसात
क़रीब
आ
जाओ
इस
क़दर
हम
से
झिजकने
की
ज़रूरत
क्या
है
ज़िंदगी
भर
का
है
अब
साथ
क़रीब
आ
जाओ
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Sahir Ludhianvi
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कभी
ख़ुद
पे
कभी
हालात
पे
रोना
आया
बात
निकली
तो
हर
इक
बात
पे
रोना
आया
हम
तो
समझे
थे
कि
हम
भूल
गए
हैं
उन
को
क्या
हुआ
आज
ये
किस
बात
पे
रोना
आया
किस
लिए
जीते
हैं
हम
किस
के
लिए
जीते
हैं
बारहा
ऐसे
सवालात
पे
रोना
आया
कौन
रोता
है
किसी
और
की
ख़ातिर
ऐ
दोस्त
सब
को
अपनी
ही
किसी
बात
पे
रोना
आया
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Sahir Ludhianvi
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तेरा
मिलना
ख़ुशी
की
बात
सही
तुझ
से
मिल
कर
उदास
रहता
हूँ
Sahir Ludhianvi
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लोग
औरत
को
फ़क़त
जिस्म
समझ
लेते
हैं
रुह
भी
होती
है
उस
में
ये
कहाँ
सोचते
हैं
Sahir Ludhianvi
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