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Asad Khan
use mili hai sahoolat ye husn se apne
use mili hai sahoolat ye husn se apne | उसे मिली है सहूलत ये हुस्न से अपने
- Asad Khan
उसे
मिली
है
सहूलत
ये
हुस्न
से
अपने
वो
क़त्ल
कर
दे
तो
इल्ज़ाम
भी
नहीं
आता
- Asad Khan
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पूछे
हैं
वजह-ए-गिरिया-ए-ख़ूनी
जो
मुझ
सेे
लोग
क्या
देखते
नहीं
हैं
सब
उस
बे-वफ़ा
का
रंग
Meer Taqi Meer
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हमीं
को
क़ातिल
कहेगी
दुनिया
हमारा
ही
क़त्ल-ए-आम
होगा
हमीं
कुएँ
खोदते
फिरेंगे
हमीं
पे
पानी
हराम
होगा
अगर
यही
ज़ेहनियत
रही
तो
मुझे
ये
डर
है
कि
इस
सदी
में
न
कोई
अब्दुल
हमीद
होगा
न
कोई
अब्दुल
कलाम
होगा
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Meraj Faizabadi
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इक
अव्वल
दर्जे
का
पाक
इक
माहिर
है
मन
तो
तुझ
में
रमता
है
दिल
काफ़िर
फिर
है
अपनी
सोचो
क़त्ल
तुम्हें
करना
भी
है
बन्दे
का
तो
क्या
है
बन्दा
हाज़िर
है
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Vikram Gaur Vairagi
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यूँँ
बे-तरतीब
ज़ख़्मों
ने
बताया
राज़
क़ातिल
का
सलीके
से
जो
मेरा
क़त्ल
गर
होता
तो
क्या
होता
Vikram Gaur Vairagi
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तेग़-बाज़ी
का
शौक़
अपनी
जगह
आप
तो
क़त्ल-ए-आम
कर
रहे
हैं
Jaun Elia
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चुरायगा
उसी
से
आँख
क़ातिल
ज़रा
सी
जान
जिस
बिस्मिल
में
होगी
Dagh Dehlvi
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ये
उसकी
मेहरबानी
है
वो
घर
में
ही
सँवरती
है
निकल
आए
जो
महफ़िल
में
तो
क़त्ल-ए-आम
हो
जाए
Ashraf Jahangeer
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गुजर
चुकी
जुल्मते
शब-ए-हिज्र,
पर
बदन
में
वो
तीरगी
है
मैं
जल
मरुंगा
मगर
चिरागों
के
लो
को
मध्यम
नहीं
करूँगा
यह
अहद
लेकर
ही
तुझ
को
सौंपी
थी
मैंने
कलबौ
नजर
की
सरहद
जो
तेरे
हाथों
से
कत्ल
होगा
मैं
उस
का
मातम
नहीं
करूँगा
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Tehzeeb Hafi
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सरफ़रोशी
की
तमन्ना
अब
हमारे
दिल
में
है
देखना
है
ज़ोर
कितना
बाज़ू-ए-क़ातिल
में
है
Bismil Azimabadi
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ये
क़त्ल-ए-आम
और
बे-इज़्न
क़त्ल-ए-आम
क्या
कहिए
ये
बिस्मिल
कैसे
बिस्मिल
हैं
जिन्हें
क़ातिल
नहीं
मिलता
वहाँ
कितनों
को
तख़्त
ओ
ताज
का
अरमाँ
है
क्या
कहिए
जहाँ
साइल
को
अक्सर
कासा-ए-साइल
नहीं
मिलता
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Asrar Ul Haq Majaz
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देख
कर
ईद
का
चाॅंद
मैं
करता
क्या
तेरी
तस्वीर
तो
कमरे
में
रक्खी
है
Asad Khan
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हमारे
अपनों
को
जाता
भी
देखा
फिर
उनका
बाद
में
रस्ता
भी
देखा
जिसे
सोने
से
पहले
देखा
मैंने
उसी
को
ख़्वाब
में
मरता
भी
देखा
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Asad Khan
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क्या
ज़रूरी
है
शब-ए-वस्ल
में
जागा
जाए
क्या
ज़रूरी
है
हमेशा
दिए
जलते
रक्खें
Asad Khan
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ये
तेरे
ख़्वाब
से
जुड़ी
हुई
है
नींद
जो
आँख
में
भरी
हुई
है
मेरे
तो
सारे
ज़ख़्म
ताज़ा
हैं
आपकी
चोट
तो
सड़ी
हुई
है
ऐसा
क्या
काम
है
तुझे
ऐ
दोस्त
जाने
की
जल्दी
क्यूँ
लगी
हुई
है
आज
भी
इंतिज़ार
में
तेरे
इक
घड़ी
मेज़
पर
पड़ी
हुई
है
चंद
नोटों
के
नीचे
बटवे
में
उसकी
तस्वीर
भी
रखी
हुई
है
दिल
को
पत्थर
बना
के
रक्खा
है
ज़िंदगी
ठाठ
पे
अड़ी
हुई
है
कैसे
सर
पे
चढ़ूॅं
मैं
दुनिया
के
ये
तो
ख़ुद
में
बहुत
गिरी
हुई
है
वर्ना
वो
ऐसा
क्यूँ
करेगा
भला
आज
उसने
शराब
पी
हुई
है
कैसे
कह
दूॅं
उसे
मोहब्बत
नइॅं
ग़म-ए-फ़ुर्क़त
से
वो
दुखी
हुई
है
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Asad Khan
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दिल
परेशान
भी
गुज़र
जाता
तेरा
तूफ़ान
भी
गुज़र
जाता
तू
जो
लौट
आता
चाँद
रात
अगर
मेरा
रमज़ान
भी
गुज़र
जाता
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Asad Khan
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