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Asad Khan
ye tere KHvaab se ju
ye tere KHvaab se ju | ये तेरे ख़्वाब से जुड़ी हुई है
- Asad Khan
ये
तेरे
ख़्वाब
से
जुड़ी
हुई
है
नींद
जो
आँख
में
भरी
हुई
है
मेरे
तो
सारे
ज़ख़्म
ताज़ा
हैं
आपकी
चोट
तो
सड़ी
हुई
है
ऐसा
क्या
काम
है
तुझे
ऐ
दोस्त
जाने
की
जल्दी
क्यूँ
लगी
हुई
है
आज
भी
इंतिज़ार
में
तेरे
इक
घड़ी
मेज़
पर
पड़ी
हुई
है
चंद
नोटों
के
नीचे
बटवे
में
उसकी
तस्वीर
भी
रखी
हुई
है
दिल
को
पत्थर
बना
के
रक्खा
है
ज़िंदगी
ठाठ
पे
अड़ी
हुई
है
कैसे
सर
पे
चढ़ूॅं
मैं
दुनिया
के
ये
तो
ख़ुद
में
बहुत
गिरी
हुई
है
वर्ना
वो
ऐसा
क्यूँ
करेगा
भला
आज
उसने
शराब
पी
हुई
है
कैसे
कह
दूॅं
उसे
मोहब्बत
नइॅं
ग़म-ए-फ़ुर्क़त
से
वो
दुखी
हुई
है
- Asad Khan
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अब
से
तुम
भी
ग़ज़ल
कहो
प्यारे
ज़िंदगी
को
अजल
कहो
प्यारे
उसको
बस
मेरी
दिलरुबा
ही
नहीं
मेरी
मेहनत
का
फल
कहो
प्यारे
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वैसे
तो
उम्र
थी
पढ़ाई
की
ख़ैर
हम
ने
ग़ज़ल
सराई
की
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अपनी
दीद
की
कुछ
यूँँ
तासीर
भेजी
है
लिबास-ए-ईद
में
उसने
तस्वीर
भेजी
है
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उसकी
सभी
बातों
पे
पर्दा
होता
है
ऊपर
से
उसका
मीठा
लहजा
होता
है
अब
सामने
हूँ
तेरे
मुझको
देख
तो
ठहरा
हुआ
दरिया
भी
कैसा
होता
है
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Asad Khan
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वो
मेरी
आँखों
में
डर
देखता
है
यक़ीनन
मुझ
से
बेहतर
देखता
है
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