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Vikram Gaur Vairagi
ik awwal darje ka paak ik maahir hai
ik awwal darje ka paak ik maahir hai | इक अव्वल दर्जे का पाक इक माहिर है
- Vikram Gaur Vairagi
इक
अव्वल
दर्जे
का
पाक
इक
माहिर
है
मन
तो
तुझ
में
रमता
है
दिल
काफ़िर
फिर
है
अपनी
सोचो
क़त्ल
तुम्हें
करना
भी
है
बन्दे
का
तो
क्या
है
बन्दा
हाज़िर
है
- Vikram Gaur Vairagi
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ग़ैर
से
खेली
है
होली
यार
ने
डाले
मुझ
पर
दीदा-ए-ख़ूँ-बार
रंग
Imam Bakhsh Nasikh
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अपने
ख़ून
से
इतनी
तो
उम्मीदें
हैं
अपने
बच्चे
भीड़
से
आगे
निकलेंगे
Shakeel Jamali
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अश्क़-ओ-ख़ून
घुलते
हैं
तब
दीदा-ए-तर
बनती
है
दास्तान
इश्क़
में
मरने
से
अमर
बनती
है
Jaani Lakhnavi
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ये
उसकी
मेहरबानी
है
वो
घर
में
ही
सँवरती
है
निकल
आए
जो
महफ़िल
में
तो
क़त्ल-ए-आम
हो
जाए
Ashraf Jahangeer
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हमीं
को
क़ातिल
कहेगी
दुनिया
हमारा
ही
क़त्ल-ए-आम
होगा
हमीं
कुएँ
खोदते
फिरेंगे
हमीं
पे
पानी
हराम
होगा
अगर
यही
ज़ेहनियत
रही
तो
मुझे
ये
डर
है
कि
इस
सदी
में
न
कोई
अब्दुल
हमीद
होगा
न
कोई
अब्दुल
कलाम
होगा
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Meraj Faizabadi
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तेरे
बग़ैर
ख़ुदा
की
क़सम
सुकून
नहीं
सफ़ेद
बाल
हुए
हैं
हमारा
ख़ून
नहीं
न
हम
ही
लौंडे
लपाड़ी
न
कच्ची
उम्र
का
वो
ये
सोचा
समझा
हुआ
इश्क़
है
जुनून
नहीं
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Shamim Abbas
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रोज़
रोने
के
बहाने
ढूँढ़ते
है
बेबसी
से
अपने
रिश्ते
ख़ून
के
है
देख
लेंगे
फिर
ग़लत
क्या
है
सही
क्या
आ
अभी
इक
दूसरे
को
चूमते
है
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Aman Mishra 'Anant'
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उस
के
क़त्ल
पे
मैं
भी
चुप
था
मेरा
नंबर
अब
आया
मेरे
क़त्ल
पे
आप
भी
चुप
हैं
अगला
नंबर
आपका
है
Nawaz Deobandi
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तेग़-बाज़ी
का
शौक़
अपनी
जगह
आप
तो
क़त्ल-ए-आम
कर
रहे
हैं
Jaun Elia
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हम
आह
भी
करते
हैं
तो
हो
जाते
हैं
बदनाम
वो
क़त्ल
भी
करते
हैं
तो
चर्चा
नहीं
होता
Akbar Allahabadi
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चेहरा
धुँदला
सा
था
और
सुनहरे
झुमके
थे
बादल
ने
कानों
में
चाँद
के
टुकड़े
पहने
थे
इक
दूजे
को
खोने
से
हम
इतना
डरते
थे
ग़ुस्सा
भी
होते
तो
बातें
करते
रहते
थे
मैं
तो
सजदे
में
था
देखने
वाले
कहते
हैं
क़ातिल
की
तलवार
से
पहले
आँसू
निकले
थे
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Vikram Gaur Vairagi
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वरना
तो
बेवफ़ाई
किसे
कब
मुआ'फ़
है
तू
मेरी
जान
है
सो
तुझे
सब
मुआ'फ़
है
क्यूँ
पूछती
हो
मैंने
तुम्हें
माफ़
कर
दिया
ख़ामोश
हो
गया
हूँ
मैं
मतलब
मुआ'फ़
है
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Vikram Gaur Vairagi
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कूज़ागर
मिल
गया
तो
पूछूँगा
मेरी
मिट्टी
कहाँ
से
लाया
था
Vikram Gaur Vairagi
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सच
देखा
है
सच
क्या
है
सिर्फ़
नज़र
का
धोखा
है
खेल
तो
सारा
उसका
है
जिसने
पासा
फेंका
है
पीछे
चलने
वाले
ने
कुछ
आगे
का
सोचा
है
झूठ
ही
आख़िर
सच
निकले
ये
भी
तो
हो
सकता
है
तन्हा
क्यूँँ
रहते
हैं
आप
इतना
क्या
मन
लगता
है
तुमको
मोहब्बत
आती
थी
लड़ना
तुमने
सीखा
है
रौशनी
करनी
पड़ती
है
और
अँधेरा
होता
है
सब
कुछ
छोड़
रहे
हो
तुम
वैरागी
ये
सब
क्या
है
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Vikram Gaur Vairagi
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मुझको
जीना
है
इस
बदन
के
साथ
और
उसपे
भी
पूरे
मन
के
साथ
वन
में
जाते
नहीं
हैं
मन
के
साथ
मन
चला
जाता
है
हिरन
के
साथ
जीते
रहने
में
दम
घुटेगा
मगर
जीते
रहिए
इसी
घुटन
के
साथ
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Vikram Gaur Vairagi
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