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Vishal Bagh
jee humi hain muhabbat ke maare hue
jee humi hain muhabbat ke maare hue | जी हमी हैं मुहब्बत के मारे हुए
- Vishal Bagh
जी
हमी
हैं
मुहब्बत
के
मारे
हुए
दिल
के
टूटे
हुए
जाँ
से
हारे
हुए
जिन
से
बरसों
की
पहचान
थी
छुट
गई
अजनबी
आज
से
हम
तुम्हारे
हुए
इस
ज़मीं
को
भी
हम
रास
आए
नहीं
हम
वही
हैं
फ़लक
से
उतारे
हुए
एक
दिन
आई
दुनिया
लिए
अपने
ग़म
हम
भी
बैठे
थे
दामन
पसारे
हुए
दिल
जो
टूटे
नहीं
ख़ाक
में
मिल
गए
दिल
जो
टूटे
फ़लक
के
सितारे
हुए
दोष
सारा
हमारे
जुनूँ
को
न
दो
उनकी
जानिब
से
भी
कुछ
इशारे
हुए
इक
नज़र
के
तक़ाज़े
पे
सब
ने
कहा
हम
तुम्हारे
हुए
हम
तुम्हारे
हुए
- Vishal Bagh
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क्यूँँ
इक
तरफ़
निगाह
जमाए
हुए
हो
तुम
क्या
राज़
है
जो
मुझ
से
छुपाए
हुए
हो
तुम
Shakeel Badayuni
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तिरे
जमाल
की
तस्वीर
खींच
दूँ
लेकिन
ज़बाँ
में
आँख
नहीं
आँख
में
ज़बान
नहीं
Jigar Moradabadi
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मुझ
पर
निगाह-ए-नाज़
का
जब
जादू
चल
गया
मैं
रफ़्ता
रफ़्ता
क़ैस
की
सोहबत
में
ढल
गया
ज़ुल्फें
उन्होंने
खोल
के
बिखराई
थी
शजर
फिर
देखते
ही
देखते
मौसम
बदल
गया
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Shajar Abbas
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कभी
पहले
नहीं
था
जिस
क़दर
मजबूर
हूँ
मैं
आज
नज़र
आऊँ
न
ख़ुद
क्या
तुम
सेे
इतना
दूर
हूँ
मैं
आज
तुम्हारे
ज़ख़्म
को
ख़ाली
नहीं
जाने
दिया
मैंने
तुम्हारी
याद
में
ही
चीख़
के
मशहूर
हूँ
मैं
आज
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SHIV SAFAR
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गुजर
चुकी
जुल्मते
शब-ए-हिज्र,
पर
बदन
में
वो
तीरगी
है
मैं
जल
मरुंगा
मगर
चिरागों
के
लो
को
मध्यम
नहीं
करूँगा
यह
अहद
लेकर
ही
तुझ
को
सौंपी
थी
मैंने
कलबौ
नजर
की
सरहद
जो
तेरे
हाथों
से
कत्ल
होगा
मैं
उस
का
मातम
नहीं
करूँगा
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Tehzeeb Hafi
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इतने
दुख
से
भरी
है
ये
दुनिया
आँख
खुलते
ही
आँख
भर
आए
shampa andaliib
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किस
से
जा
कर
माँगिये
दर्द-ए-मोहब्बत
की
दवा
चारा-गर
अब
ख़ुद
ही
बेचारे
नज़र
आने
लगे
Shakeel Badayuni
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भीगीं
पलकें
देख
कर
तू
क्यूँँ
रुका
है
ख़ुश
हूँ
मैं
वो
तो
मेरी
आँख
में
कुछ
आ
गया
है
ख़ुश
हूँ
मैं
वो
किसी
के
साथ
ख़ुश
था
कितने
दुख
की
बात
थी
अब
मेरे
पहलू
में
आ
कर
रो
रहा
है
ख़ुश
हूँ
मैं
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Zubair Ali Tabish
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शाम
से
आँख
में
नमी
सी
है
आज
फिर
आप
की
कमी
सी
है
Gulzar
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भटकती
फिर
रही
है
आँख
घर
में
तिरी
आवाज़
इसको
दिख
रही
है
Himanshu Kiran Sharma
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उम्र
गुज़री
है
माँजते
ख़ुद
को
साफ़
हैं
पर
चमक
नहीं
पाए
डाल
ने
फूल
की
तरह
पाला
ख़ार
थे
ना
महक
नहीं
पाए
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Vishal Bagh
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तुम
जो
कहते
थे
ना
इक
दिन
छू
लोगे
छू
लेते
ना
मेरा
मन
भी
करता
था
Vishal Bagh
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आज
फिर
कुफ़्र
कमाया
हमने
शोर
को
शे'र
सुनाया
हमने
Vishal Bagh
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ख़बर
सुनकर
वो
ये
इतरा
रहा
है
मुझे
उसका
बिछोड़ा
खा
रहा
है
मेरे
सय्याद
को
कोई
बुला
दो
मेरे
पिंजरे
को
तोड़ा
जा
रहा
है
निकलना
है
हमें
कब
से
सफ़र
पर
मगर
ये
जिस्म
आड़े
आ
रहा
है
मैं
उसको
याद
भी
करना
न
चाहूँ
वो
आकर
ख़्वाब
में
उकसा
रहा
है
चलो
उसको
अज़ीयत
से
निकालें
सुना
है
अब
भी
वो
पछता
रहा
है
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Vishal Bagh
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उसकी
तस्वीर
बंद
आँखों
से
पहले
बनती
थी
अब
नहीं
बनती
Vishal Bagh
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