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Gulzar
shaam se aankh men nami si hai
shaam se aankh men nami si hai | शाम से आँख में नमी सी है
- Gulzar
शाम
से
आँख
में
नमी
सी
है
आज
फिर
आप
की
कमी
सी
है
- Gulzar
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ये
इम्तियाज़
ज़रूरी
है
अब
इबादत
में
वही
दु'आ
जो
नज़र
कर
रही
है
लब
भी
करें
Abhishek shukla
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भटकती
फिर
रही
है
आँख
घर
में
तिरी
आवाज़
इसको
दिख
रही
है
Himanshu Kiran Sharma
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मैं
नज़र
से
पी
रहा
था
तो
ये
दिल
ने
बद-दुआ
दी
तिरा
हाथ
ज़िंदगी
भर
कभी
जाम
तक
न
पहुँचे
Shakeel Badayuni
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फिर
किसी
के
सामने
चश्म-ए-तमन्ना
झुक
गई
शौक़
की
शोख़ी
में
रंग-ए-एहतराम
आ
ही
गया
Asrar Ul Haq Majaz
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मुझे
भी
बख़्श
दे
लहजे
की
ख़ुशबयानी
सब
तेरे
असर
में
हैं
अल्फ़ाज़
सब,
म'आनी
सब
मेरे
बदन
को
खिलाती
है
फूल
की
मानिंद
कि
उस
निगाह
में
है
धूप,
छाँव,
पानी
सब
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Subhan Asad
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लग
गई
मुझको
नज़र
बेशक़
तुम्हारी
आईनों
मैं
बहुत
ख़ुश
था
किसी
इक
सिलसिले
से
उन
दिनों
Aarush Sarkaar
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जब
मिली
आँख
होश
खो
बैठे
कितने
हाज़िर
जवाब
हैं
हम
लोग
Jigar Moradabadi
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तुम्हारा
काम
इतना
है
कि
बस
काजल
लगा
लेना
तुम्हारी
आँख
की
ख़ातिर
नज़ारे
मैं
बनाऊँगा
Khalid Nadeem Shani
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भीगी
पलकें
देख
कर
तू
क्यूँँ
रुका
है
ख़ुश
हूँ
मैं
वो
तो
मेरी
आँख
में
कुछ
आ
गया
है
ख़ुश
हूँ
मैं
वो
किसी
के
साथ
ख़ुश
था
कितने
दुख
की
बात
थी
अब
मेरे
पहलू
में
आकर
रो
रहा
है
ख़ुश
हूँ
मैं
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Zubair Ali Tabish
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माँग
सिन्दूर
भरी
हाथ
हिनाई
करके
रूप
जोबन
का
ज़रा
और
निखर
आएगा
जिसके
होने
से
मेरी
रात
है
रौशन
रौशन
चाँद
में
आज
वही
अक्स
नज़र
आएगा
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Azhar Iqbal
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गर्म
लाशें
गिरीं
फ़सीलों
से
आसमाँ
भर
गया
है
चीलों
से
सूली
चढ़ने
लगी
है
ख़ामोशी
लोग
आए
हैं
सुन
के
मीलों
से
कान
में
ऐसे
उतरी
सरगोशी
बर्फ़
फिसली
हो
जैसे
टीलों
से
गूँज
कर
ऐसे
लौटती
है
सदा
कोई
पूछे
हज़ारों
मीलों
से
प्यास
भरती
रही
मिरे
अंदर
आँख
हटती
नहीं
थी
झीलों
से
लोग
कंधे
बदल
बदल
के
चले
घाट
पहुँचे
बड़े
वसीलों
से
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Gulzar
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जिस
की
आँखों
में
कटी
थीं
सदियाँ
उस
ने
सदियों
की
जुदाई
दी
है
Gulzar
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कोई
ख़ामोश
ज़ख़्म
लगती
है
ज़िंदगी
एक
नज़्म
लगती
है
बज़्म-ए-याराँ
में
रहता
हूँ
तन्हा
और
तंहाई
बज़्म
लगती
है
अपने
साए
पे
पाँव
रखता
हूँ
छाँव
छालों
को
नर्म
लगती
है
चाँद
की
नब्ज़
देखना
उठ
कर
रात
की
साँस
गर्म
लगती
है
ये
रिवायत
कि
दर्द
महके
रहें
दिल
की
देरीना
रस्म
लगती
है
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Gulzar
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दिन
कुछ
ऐसे
गुज़ारता
है
कोई
जैसे
एहसाँ
उतारता
है
कोई
दिल
में
कुछ
यूँँ
सँभालता
हूँ
ग़म
जैसे
ज़ेवर
सँभालता
है
कोई
आइना
देख
कर
तसल्ली
हुई
हम
को
इस
घर
में
जानता
है
कोई
पेड़
पर
पक
गया
है
फल
शायद
फिर
से
पत्थर
उछालता
है
कोई
देर
से
गूँजते
हैं
सन्नाटे
जैसे
हम
को
पुकारता
है
कोई
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Gulzar
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शाम
से
आज
सांस
भारी
है
बे-क़रारी
सी
बे-क़रारी
है
आप
के
बाद
हर
घड़ी
हम
ने
आप
के
साथ
ही
गुज़ारी
है
रात
को
दे
दो
चांदनी
की
रिदा
दिन
की
चादर
अभी
उतारी
है
शाख़
पर
कोई
क़हक़हा
तो
खिले
कैसी
चुप
सी
चमन
में
तारी
है
कल
का
हर
वाक़िआ
तुम्हारा
था
आज
की
दास्तां
हमारी
है
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