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Gulzar
jis ki aankhoñ men kati theen sadiyaanus ne sadiyon ki judaai dii hai
jis ki aankhoñ men kati theen sadiyaanus ne sadiyon ki judaai dii hai | जिस की आँखों में कटी थीं सदियाँ
- Gulzar
जिस
की
आँखों
में
कटी
थीं
सदियाँ
उस
ने
सदियों
की
जुदाई
दी
है
- Gulzar
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एक
अकेले
की
ख़ातिर
जब
दो
कप
कॉफी
में
चीनी
आज
मिलाते
हैं
तो
रो
देते
हैं
हम
Atul K Rai
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मैं
तेरे
बाद
कोई
तेरे
जैसा
ढूँढता
हूँ
जो
बे-वफ़ाई
करे
और
बे-वफ़ा
न
लगे
Abbas Tabish
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लो
फिर
तिरे
लबों
पे
उसी
बे-वफ़ा
का
ज़िक्र
अहमद-'फ़राज़'
तुझ
से
कहा
ना
बहुत
हुआ
Ahmad Faraz
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किसी
बे-वफ़ा
से
बिछड़
के
तू
मुझे
मिल
गया
भी
तो
क्या
हुआ
मेरे
हक़
में
वो
भी
बुरा
हुआ
मेरे
हक़
में
ये
भी
बुरा
हुआ
Mumtaz Naseem
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ईद
का
दिन
तो
है
मगर
'जाफ़र'
मैं
अकेले
तो
हँस
नहीं
सकता
Jaafar Sahni
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कभी
न
लौट
के
आया
वो
शख़्स,
कहता
था
ज़रा
सा
हिज्र
है
बस
सरसरी
बिछड़ना
है
Subhan Asad
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हिज्र
में
तुमने
केवल
बाल
बिगाड़े
हैं
हमने
जाने
कितने
साल
बिगाड़े
हैं
Anand Raj Singh
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वो
बे-वफ़ा
है
तो
क्या
मत
कहो
बुरा
उसको
कि
जो
हुआ
सो
हुआ
ख़ुश
रखे
ख़ुदा
उसको
Naseer Turabi
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कोई
समुंदर,
कोई
नदी
होती
कोई
दरिया
होता
हम
जितने
प्यासे
थे
हमारा
एक
गिलास
से
क्या
होता
ताने
देने
से
और
हम
पे
शक
करने
से
बेहतर
था
गले
लगा
के
तुमने
हिजरत
का
दुख
बाट
लिया
होता
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Tehzeeb Hafi
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वो
शादी
तो
करेगी
मगर
एक
शर्त
पर
हम
हिज्र
में
रहेंगे
अगर
नौकरी
नहीं
Harsh saxena
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बीते
रिश्ते
तलाश
करती
है
ख़ुशबू
ग़ुंचे
तलाश
करती
है
जब
गुज़रती
है
उस
गली
से
सबा
ख़त
के
पुर्ज़े
तलाश
करती
है
अपने
माज़ी
की
जुस्तुजू
में
बहार
पीले
पत्ते
तलाश
करती
है
एक
उम्मीद
बार
बार
आ
कर
अपने
टुकड़े
तलाश
करती
है
बूढ़ी
पगडंडी
शहर
तक
आ
कर
अपने
बेटे
तलाश
करती
है
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दिन
कुछ
ऐसे
गुज़ारता
है
कोई
जैसे
एहसाँ
उतारता
है
कोई
दिल
में
कुछ
यूँँ
सँभालता
हूँ
ग़म
जैसे
ज़ेवर
सँभालता
है
कोई
आइना
देख
कर
तसल्ली
हुई
हम
को
इस
घर
में
जानता
है
कोई
पेड़
पर
पक
गया
है
फल
शायद
फिर
से
पत्थर
उछालता
है
कोई
देर
से
गूँजते
हैं
सन्नाटे
जैसे
हम
को
पुकारता
है
कोई
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ये
शुक्र
है
कि
मिरे
पास
तेरा
ग़म
तो
रहा
वगर्ना
ज़िंदगी
भर
को
रुला
दिया
होता
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जब
भी
आँखों
में
अश्क
भर
आए
लोग
कुछ
डूबते
नज़र
आए
अपना
मेहवर
बदल
चुकी
थी
ज़मीं
हम
ख़ला
से
जो
लौट
कर
आए
चाँद
जितने
भी
गुम
हुए
शब
के
सब
के
इल्ज़ाम
मेरे
सर
आए
चंद
लम्हे
जो
लौट
कर
आए
रात
के
आख़िरी
पहर
आए
एक
गोली
गई
थी
सू-ए-फ़लक
इक
परिंदे
के
बाल-ओ-पर
आए
कुछ
चराग़ों
की
साँस
टूट
गई
कुछ
ब-मुश्किल
दम-ए-सहर
आए
मुझ
को
अपना
पता-ठिकाना
मिले
वो
भी
इक
बार
मेरे
घर
आए
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आप
के
बाद
हर
घड़ी
हम
ने
आप
के
साथ
ही
गुज़ारी
है
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