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Subhan Asad
kabhi na laut ke aaya vo shakhs kahtaa tha
kabhi na laut ke aaya vo shakhs kahtaa tha | कभी न लौट के आया वो शख़्स, कहता था
- Subhan Asad
कभी
न
लौट
के
आया
वो
शख़्स,
कहता
था
ज़रा
सा
हिज्र
है
बस
सरसरी
बिछड़ना
है
- Subhan Asad
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हिज्र
में
इश्क़
यूँँ
रखा
आबाद
हिचकियांँ
तन्हा
तन्हा
लेते
रहे
Siraj Tonki
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उस
मेहरबाँ
नज़र
की
इनायत
का
शुक्रिया
तोहफ़ा
दिया
है
ईद
पे
हम
को
जुदाई
का
Unknown
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'मुनीर'
अच्छा
नहीं
लगता
ये
तेरा
किसी
के
हिज्र
में
बीमार
होना
Muneer Niyazi
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उस
सेे
तो
मैं
बिछड़
गया
अब
देख
ऐ
'पवन'
कब
दुनिया
आए
रास
यही
सोचता
रहा
Pawan Kumar
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रेल
की
सीटी
में
कैसे
हिज्र
की
तम्हीद
थी
उसको
रुख़्सत
करके
घर
लौटे
तो
अंदाज़ा
हुआ
Parveen Shakir
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लंबा
हिज्र
गुज़ारा
तब
ये
मिलने
के
पल
चार
मिले
जैसे
एक
बड़े
हफ़्ते
में
छोटा
सा
इतवार
मिले
माना
थोड़ा
मुश्किल
है
पर
रोज़
दु'आ
में
माँगा
है
जो
मुझ
सेे
भी
ज़्यादा
चाहे
तुझको
ऐसा
यार
मिले
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Bhaskar Shukla
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अभी
तो
जान
कहता
फिर
रहा
है
तू
तुझे
हम
हिज्र
वाले
साल
पूछेंगे
Parul Singh "Noor"
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या'नी
कि
इश्क़
अपना
मुकम्मल
नहीं
हुआ
गर
मैं
तुम्हारे
हिज्र
में
पागल
नहीं
हुआ
वो
शख़्स
सालों
बाद
भी
कितना
हसीन
है
वो
रंग
कैनवस
पे
कभी
डल
नहीं
हुआ
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Kushal Dauneria
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दिल
हिज्र
के
दर्द
से
बोझल
है
अब
आन
मिलो
तो
बेहतर
हो
इस
बात
से
हम
को
क्या
मतलब
ये
कैसे
हो
ये
क्यूँँकर
हो
Ibn E Insha
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तुम्हारा
हिज्र
मना
लूँ
अगर
इजाज़त
हो
मैं
दिल
किसी
से
लगा
लूँ
अगर
इजाज़त
हो
Jaun Elia
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गिला
नहीं
कि
मेरे
हाल
पर
हँसी
दुनिया
गिला
तो
ये
है
कि
पहली
हँसी
तुम्हारी
थी
Subhan Asad
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ये
मेरी
ज़िद
ही
ग़लत
थी
कि
तुझ
सेा
बन
जाऊँ
मैं
अब
न
अपनी
तरह
हूँ
न
तेरे
जैसा
हूँ
हमारे
बीच
ज़माने
की
बदगुमानी
है
मैं
ज़िंदगी
से
ज़रा
कम
ही
बात
करता
हूँ
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Subhan Asad
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आज
है
कुछ
सबब
आज
की
शब
न
जा
जान
है
ज़ेर-ए-लब
आज
की
शब
न
जा
क्या
पता
फिर
तिरे
वस्ल
की
साअतें
हूँ
कहाँ
कैसे
कब
आज
की
शब
न
जा
चाँद
क्या
फूल
क्या
शम्अ
क्या
रंग
क्या
हैं
परेशान
सब
आज
की
शब
न
जा
वक़्त
को
कैसे
तरतीब
देते
हैं
लोग
आ
सिखा
दे
ये
अब
आज
की
शब
न
जा
वो
सहर
भी
तुझी
से
सहर
थी
'असद'
शब
भी
तुम
से
है
शब
आज
की
शब
न
जा
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Subhan Asad
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ये
कांटे,
ये
धूप,
ये
पत्थर
इनसे
कैसा
डरना
है
राहें
मुश्किल
हो
जाएँ
तो
छोड़ी
थोड़ी
जाती
हैं
Subhan Asad
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इस
तरह
से
तर्जुमानी
कर
गया
मेरे
अश्कों
को
वो
पानी
कर
गया
उस
ने
चेहरे
से
हटा
डाला
नक़ाब
और
मेरी
ग़ज़लें
पुरानी
कर
गया
रख
गया
वो
अपने
कपड़े
सूखने
धूप
भी
कितनी
सुहानी
कर
गया
भूल
जाने
की
क़सम
देना
तेरा
याद
आने
की
निशानी
कर
गया
दो
घड़ी
को
पास
आया
था
कोई
दिल
पे
बरसों
हुक्मरानी
कर
गया
जिस
पे
मैं
ईमान
ले
आया
'असद'
मुझ
से
वो
ही
बे-ईमानी
कर
गया
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Subhan Asad
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