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Subhan Asad
aaj hai kuchh sabab aaj ki shab na ja
aaj hai kuchh sabab aaj ki shab na ja | आज है कुछ सबब आज की शब न जा
- Subhan Asad
आज
है
कुछ
सबब
आज
की
शब
न
जा
जान
है
ज़ेर-ए-लब
आज
की
शब
न
जा
क्या
पता
फिर
तिरे
वस्ल
की
साअतें
हूँ
कहाँ
कैसे
कब
आज
की
शब
न
जा
चाँद
क्या
फूल
क्या
शम्अ
क्या
रंग
क्या
हैं
परेशान
सब
आज
की
शब
न
जा
वक़्त
को
कैसे
तरतीब
देते
हैं
लोग
आ
सिखा
दे
ये
अब
आज
की
शब
न
जा
वो
सहर
भी
तुझी
से
सहर
थी
'असद'
शब
भी
तुम
से
है
शब
आज
की
शब
न
जा
- Subhan Asad
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शब
जो
होली
की
है
मिलने
को
तिरे
मुखड़े
से
जान
चाँद
और
तारे
लिए
फिरते
हैं
अफ़्शाँ
हाथ
में
Mushafi Ghulam Hamdani
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रात
यूँँ
दिल
में
तिरी
खोई
हुई
याद
आई
जैसे
वीराने
में
चुपके
से
बहार
आ
जाए
Faiz Ahmad Faiz
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मैं
रोज़
रात
यही
सोच
कर
तो
सोता
हूँ
कि
कल
से
वक़्त
निकालूँगा
ज़िन्दगी
के
लिए
Swapnil Tiwari
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बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल
है
दुनिया
मिरे
आगे
होता
है
शब-ओ-रोज़
तमाशा
मिरे
आगे
Mirza Ghalib
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शब
भर
इक
आवाज़
बनाई
सुब्ह
हुई
तो
चीख़
पड़े
रोज़
का
इक
मामूल
है
अब
तो
ख़्वाब-ज़दा
हम
लोगों
का
Abhishek shukla
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शब
बसर
करनी
है,
महफ़ूज़
ठिकाना
है
कोई
कोई
जंगल
है
यहाँ
पास
में
?
सहरा
है
कोई
?
Umair Najmi
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शिकस्ता
दिल
शब-ए-ग़म
दर्द
रुसवाई
अरे
इतना
तो
चलता
है
मुहब्बत
में
Sapna Moolchandani
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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तेरी
आँखों
के
लिए
इतनी
सज़ा
काफ़ी
है
आज
की
रात
मुझे
ख़्वाब
में
रोता
हुआ
देख
Abhishek shukla
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क्या
बैठ
जाएँ
आन
के
नज़दीक
आप
के
बस
रात
काटनी
है
हमें
आग
ताप
के
कहिए
तो
आप
को
भी
पहन
कर
मैं
देख
लूँ
मा'शूक़
यूँँ
तो
हैं
ही
नहीं
मेरी
नाप
के
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Farhat Ehsaas
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हम
कुछ
ऐसे
उसके
आगे
अपनी
वफ़ा
रख
देते
हैं
बच्चे
जैसे
रेल
की
पटरी
पर
सिक्का
रख
देते
हैं
तस्वीर-ए-ग़म,
दिल
के
आँसू,
रंजो-नदामत,
तन्हाई
उसको
ख़त
लिखते
हैं
ख़त
में
हम
क्या
क्या
रख
देते
हैं
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Subhan Asad
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ग़म
से
फ़ुर्सत
नहीं
कि
तुझ
से
कहें
तुझ
को
रग़बत
नहीं
कि
तुझ
से
कहें
हिज्र-पत्थर
गड़ा
है
सीने
में
पर
वो
शिद्दत
नहीं
कि
तुझ
से
कहें
आरज़ू
कसमसाए
फिरती
है
कोई
सूरत
नहीं
कि
तुझ
से
कहें
ख़ामुशी
की
ज़बाँ
समझ
लेना
अपनी
आदत
नहीं
कि
तुझ
से
कहें
दर्द
हद
से
सिवा
तो
है
लेकिन
ऐसी
हालत
नहीं
कि
तुझ
से
कहें
दिल
को
अब
भी
तिरा
जुनूँ
है
'असद'
ऐसी
वहशत
नहीं
कि
तुझ
से
कहें
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Subhan Asad
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रिश्तों
की
ये
नाज़ुक
डोरें
तोड़ी
थोड़ी
जाती
हैं,
अपनी
आँखें
दुखती
हों
तो
फोड़ी
थोड़ी
जाती
हैं
ये
कांटे,
ये
धूप,
ये
पत्थर
इनसे
कैसा
डरना
है
राहें
मुश्किल
हो
जाएँ
तो
छोड़ी
थोड़ी
जाती
हैं
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Subhan Asad
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तूने
सोचा
भी
है
जानाँ
कि
तेरे
वादे
ने
कितनी
सदियों
से
नहीं
पहना
अमल
का
पैकर
Subhan Asad
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ये
सानिहा
भी
शब-ए-हिज्र
आ
पड़ा
हम
पर
तेरा
ख़्याल
तो
आया
तेरी
तलब
न
हुई
Subhan Asad
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