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Mushafi Ghulam Hamdani
shab jo holi ki hai milne ko tire mukhde se jaan
shab jo holi ki hai milne ko tire mukhde se jaan | शब जो होली की है मिलने को तिरे मुखड़े से जान
- Mushafi Ghulam Hamdani
शब
जो
होली
की
है
मिलने
को
तिरे
मुखड़े
से
जान
चाँद
और
तारे
लिए
फिरते
हैं
अफ़्शाँ
हाथ
में
- Mushafi Ghulam Hamdani
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कुछ
फ़र्क़
क्यूँँ
हो
मुझ
में
जो
रौशन
हुए
हैं
आप
जलता
नहीं
है
चाँद
सितारों
को
देखकर
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Tanoj Dadhich
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रात
के
जिस्म
में
जब
पहला
पियाला
उतरा
दूर
दरिया
में
मेरे
चाँद
का
हाला
उतरा
Kumar Vishwas
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इक
रात
उस
ने
चंद
सितारे
बुझा
दिए
उस
को
लगा
था
कोई
उन्हें
गिन
नहीं
रहा
Khurram Afaq
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रात
भर
ता'रीफ़
मैंने
की
तुम्हारे
रूप
की
चाँद
इतना
जल
गया
सुनकर
कि
सूरज
हो
गया
Chandan Rai
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यही
है
ज़िंदगी
कुछ
ख़्वाब
चंद
उम्मीदें
इन्हीं
खिलौनों
से
तुम
भी
बहल
सको
तो
चलो
Nida Fazli
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इश्क़
के
इज़हार
में
हर-चंद
रुस्वाई
तो
है
पर
करूँँ
क्या
अब
तबीअत
आप
पर
आई
तो
है
Akbar Allahabadi
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तुम
भी
लिखना
तुम
ने
उस
शब
कितनी
बार
पिया
पानी
तुम
ने
भी
तो
छज्जे
ऊपर
देखा
होगा
पूरा
चाँद
Nida Fazli
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मैं
पर्वतों
से
लड़ता
रहा
और
चंद
लोग
गीली
ज़मीन
खोद
के
फ़रहाद
हो
गए
Rahat Indori
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ईद
के
बा'द
वो
मिलने
के
लिए
आए
हैं
ईद
का
चाँद
नज़र
आने
लगा
ईद
के
बा'द
Unknown
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रोज़
तारों
को
नुमाइश
में
ख़लल
पड़ता
है
चाँद
पागल
है
अँधेरे
में
निकल
पड़ता
है
Rahat Indori
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मौसम-ए-होली
है
दिन
आए
हैं
रंग
और
राग
के
हम
से
तुम
कुछ
माँगने
आओ
बहाने
फाग
के
Mushafi Ghulam Hamdani
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'मुसहफ़ी'
फ़ारसी
को
ताक़
पे
रख
अब
है
अशआर-ए-हिंदवी
का
रिवाज
Mushafi Ghulam Hamdani
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ख़्वाब
था
या
ख़याल
था
क्या
था
हिज्र
था
या
विसाल
था
क्या
था
मेरे
पहलू
में
रात
जा
कर
वो
माह
था
या
हिलाल
था
क्या
था
चमकी
बिजली
सी
पर
न
समझे
हम
हुस्न
था
या
जमाल
था
क्या
था
शब
जो
दिल
दो
दो
हाथ
उछलता
था
वज्द
था
या
वो
हाल
था
क्या
था
जिस
को
हम
रोज़-ए-हिज्र
समझे
थे
माह
था
या
वो
साल
था
क्या
था
'मुसहफ़ी'
शब
जो
चुप
तू
बैठा
था
क्या
तुझे
कुछ
मलाल
था
क्या
था
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Mushafi Ghulam Hamdani
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जी
में
है
इतने
बोसे
लीजे
कि
आज
महर
उस
के
वहाँ
से
उठ
जावे
Mushafi Ghulam Hamdani
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डाल
कर
ग़ुंचों
की
मुँदरी
शाख़-ए-गुल
के
कान
में
अब
के
होली
में
बनाना
गुल
को
जोगन
ऐ
सबा
Mushafi Ghulam Hamdani
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