kam az kam ik zam | कम अज़ कम इक ज़माना चाहता हूँ

  - Kazim Rizvi
कमअज़कमइकज़मानाचाहताहूँ
कितुमकोभूलजानाचाहताहूँ
ख़ुदारामुझकोतन्हाछोड़दीजे
मैंखुलकरमुस्कुरानाचाहताहूँ
सरासरआपहूँमद्देमुक़ाबिल
ख़ुदीख़ुदकोहरानाचाहताहूँ
मेरेहक़मेंउरूस-ए-शबहैमक़्तल
सोउससेलबमिलानाचाहताहूँ
येआलमहै,किअपनेहीलहूमें
सरासरडूबजानाचाहताहूँ
सुनाहैतोड़तेहोदिलसभोंका
सोतुमसेदिललगानाचाहताहूँ
उसीबज़्म-ए-तरबकीआरज़ूहै
वहीमंज़रपुरानाचाहताहूँ
नज़रसेतीरफैंकोहो,सोमैंभी
जिगरपरतीरखानाचाहताहूँ
चराग़ोंकोपयाम-ए-ख़ामुशीदे
तेरेनज़दीकआनाचाहताहूँ
  - Kazim Rizvi
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