koi KHaamosh zakham lagti hai | कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है

  - Gulzar
कोईख़ामोशज़ख़्मलगतीहै
ज़िंदगीएकनज़्मलगतीहै
बज़्म-ए-याराँमेंरहताहूँतन्हा
औरतंहाईबज़्मलगतीहै
अपनेसाएपेपाँवरखताहूँ
छाँवछालोंकोनर्मलगतीहै
चाँदकीनब्ज़देखनाउठकर
रातकीसाँसगर्मलगतीहै
येरिवायतकिदर्दमहकेरहें
दिलकीदेरीनारस्मलगतीहै
  - Gulzar
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