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Shakeel Badayuni
kyun ik taraf nigaah jamaaye hue ho tum
kyun ik taraf nigaah jamaaye hue ho tum | क्यूँँ इक तरफ़ निगाह जमाए हुए हो तुम
- Shakeel Badayuni
क्यूँँ
इक
तरफ़
निगाह
जमाए
हुए
हो
तुम
क्या
राज़
है
जो
मुझ
से
छुपाए
हुए
हो
तुम
- Shakeel Badayuni
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अलमास
धरे
रह
जाते
हैं
बिकता
है
तो
पत्थर
बिकता
है
अजनास
नहीं
इस
दुनिया
में
इंसाँ
का
मुक़द्दर
बिकता
है
'खालिद
सज्जाद'
सुनार
हूँ
मैं
इस
ग़म
को
ख़ूब
समझता
हूँ
जब
बेटा
छुप
कर
रोता
है
तब
माँ
का
ज़ेवर
बिकता
है
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Khalid Sajjad
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तू
ने
ये
क्या
ग़ज़ब
किया
मुझ
को
भी
फ़ाश
कर
दिया
मैं
ही
तो
एक
राज़
था
सीना-ए-काएनात
में
Allama Iqbal
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किसी
के
झूठ
से
पर्दा
हटाकर
हमारा
सच
बहुत
रोया
था
उस
दिन
Shadab Asghar
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दीवारें
छोटी
होती
थीं
लेकिन
पर्दा
होता
था
तालों
की
ईजाद
से
पहले
सिर्फ़
भरोसा
होता
था
Azhar Faragh
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रूहों
के
पर्दा-पोश
गुनाहों
से
बे-ख़बर
जिस्मों
की
नेकियाँ
ही
गिनाता
रहा
हूँ
मैं
Jaun Elia
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चुप
रहते
हैं
चुप
रहने
दो
राज़
बताओ
खोले
क्या
बात
वफ़ा
की
तुम
करती
हो
बोलो
हम
कुछ
बोले
क्या
उल्फ़त
तो
अफ़साना
है
तुम
करती
खूब
सियासत
हो
हम
भी
हैं
मक़बूल
बहुत
अब
बोल
किसी
के
होलें
क्या
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Anand Raj Singh
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मोहब्बत
को
छुपाए
लाख
कोई
छुप
नहीं
सकती
ये
वो
अफ़्साना
है
जो
बे-कहे
मशहूर
होता
है
Lala Madhav Ram Jauhar
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सब
ने
माना
मरने
वाला
दहशत-गर्द
और
क़ातिल
था
माँ
ने
फिर
भी
क़ब्र
पे
उस
की
राज-दुलारा
लिक्खा
था
Ahmad Salman
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अव्वल
तो
तेरी
दोस्ती
पर
शक
नहीं
कोई
और
दूसरा
ये
मुझको
तेरे
राज़
पता
हैं
Tanoj Dadhich
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सूख
जाता
जल्द
है
फिर
भी
निशानी
के
लिए
फूल
इक
छुप
के
किताबों
में
छिपाना
इश्क़
है
Parul Singh "Noor"
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शाम-ए-ग़म
करवट
बदलता
ही
नहीं
वक़्त
भी
ख़ुद्दार
है
तेरे
बग़ैर
Shakeel Badayuni
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तिरे
बग़ैर
अजब
बज़्म-ए-दिल
का
आलम
है
चराग़
सैंकड़ों
जलते
हैं
रौशनी
कम
है
Shakeel Badayuni
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बे-झिझक
आ
गए
बेख़बर
आ
गए
आज
रिन्दों
में
वाइज़
किधर
आ
गए
गुफ़्तगू
उन
सेे
होती
ये
किस्मत
कहाँ
ये
भी
उनका
करम
है
नज़र
आ
गए
आना
जाना
भी
ये
ख़ूब
है
आप
का
बे-कहे
चल
दिए
बेख़बर
आ
गए
हम
तो
रोते
ही
थे
इश्क़
में
रात
दिन
तुम
भी
आख़िर
इसी
राह
पर
आ
गए
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Shakeel Badayuni
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यूँं
तो
हर
शाम
उमीदों
में
गुज़र
जाती
है
आज
कुछ
बात
है
जो
शाम
पे
रोना
आया
Shakeel Badayuni
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दिल
के
बहलाने
की
तदबीर
तो
है
तू
नहीं
है
तिरी
तस्वीर
तो
है
हम-सफ़र
छोड़
गए
मुझको
तो
क्या
साथ
मेरे
मिरी
तक़दीर
तो
है
क़ैद
से
छूट
के
भी
क्या
पाया
आज
भी
पाँव
में
ज़ंजीर
तो
है
क्या
मजाल
उनकी
न
दें
ख़त
का
जवाब
बात
कुछ
बाइस-ए-ताख़ीर
तो
है
पुर्सिश-ए-हाल
को
वो
आ
ही
गए
कुछ
भी
हो
इश्क़
में
तासीर
तो
है
ग़म
की
दुनिया
रहे
आबाद
'शकील'
मुफ़्लिसी
में
कोई
जागीर
तो
है
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Shakeel Badayuni
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