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Umar Farhat
aasmaañ se utarta hua
aasmaañ se utarta hua | आसमाँ से उतरता हुआ
- Umar Farhat
आसमाँ
से
उतरता
हुआ
एक
तारा
बुझाया
हुआ
आज
भी
रात
की
रानी
के
तन
से
है
नाग
लिपटा
हुआ
एक
पत्ता
किसी
शाख़
से
टूट
कर
आज
तन्हा
हुआ
काग़ज़ी
तन
है
उस
का
मगर
धूप
में
कब
से
झुलसा
हुआ
पहला
अक्षर
तिरे
नाम
का
रौशनी
से
है
लिक्खा
हुआ
- Umar Farhat
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तेरे
दामन
में
सितारे
हैं
तो
होंगे
ऐ
फ़लक
मुझ
को
अपनी
माँ
की
मैली
ओढ़नी
अच्छी
लगी
Munawwar Rana
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देख
तो
दिल
कि
जाँ
से
उठता
है
ये
धुआँ
सा
कहाँ
से
उठता
है
गोर
किस
दिलजले
की
है
ये
फ़लक
शोला
इक
सुब्ह
यां
से
उठता
है
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Meer Taqi Meer
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हम
वो
हैं
जो
नइँ
डरते
वक़्त
के
इम्तिहान
से
वो
परिंदे
और
थे
जो
डर
गए
आसमान
से
Madhav
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मेरी
हर
गुफ़्तगू
ज़मीं
से
रही
यूँँ
तो
फ़ुर्सत
में
आसमान
भी
था
Madan Mohan Danish
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आसमाँ
में
है
ख़ुदा,
क्या
सब
दुआएंँ
आसमाँ
तक
जा
रही
हैं
मेरी
इक
फ़रयाद
पूरी
हो
तो
मैं
मानूँ
वहाँ
तक
जा
रही
हैं
Saahir
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निगाहों
के
तक़ाज़े
चैन
से
मरने
नहीं
देते
यहाँ
मंज़र
ही
ऐसे
हैं
कि
दिल
भरने
नहीं
देते
हमीं
उन
से
उमीदें
आसमाँ
छूने
की
करते
हैं
हमीं
बच्चों
को
अपने
फ़ैसले
करने
नहीं
देते
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Waseem Barelvi
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ज़मीं
मेरे
सज्दे
से
थर्रा
गई
मुझे
आसमाँ
से
पुकारा
गया
Siraj Faisal Khan
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मैं
घंटों
आसमाँ
में
देखता
था
ज़मीं
को
पीठ
के
नीचे
लगा
के
Siddharth Saaz
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तुम
आसमान
पे
जाना
तो
चाँद
से
कहना
जहाँ
पे
हम
हैं
वहाँ
चांदनी
बहुत
कम
है
Shakeel Azmi
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पहले
सर
की
ये
शिकायत
थी
फ़लक
ऊँचा
है
अब
मिरे
पाँव
ये
कहते
हैं
कि
धरती
है
कहाँ
Rauf Raza
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जिस्म
सियाही
बनाऊँगा
तेरा
हर्फ़
सजाऊँगा
तू
बहता
पानी
बन
जा
मैं
मछली
बन
जाऊँगा
कल
मौसम
की
हथेली
पर
नाम
तिरा
खुदवाऊँगा
अपना
ग़ुबार
उड़ा
कर
मैं
कुछ
तस्वीर
बनाऊँगा
किसी
किवाड़
की
आड़
में
अब
तुझ
को
ला
के
छुपाऊँगा
तिरे
बदन
के
पानी
से
मैं
सूरज
चमकाऊँगा
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Umar Farhat
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इस
में
क्या
दलील
है
एक
संग-ए-मील
है
हँस
के
तोड़
दे
इसे
दर्द
की
फ़सील
है
शोहरतों
के
वास्ते
प्यास
ही
सबील
है
देखते
हैं
हर
तरफ़
क्या
कोई
अदील
है
जिस
का
नाम
है
'उमर'
वो
भी
बे-क़बील
है
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Umar Farhat
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आसमाँ
हो
के
भी
ज़मीं
होना
इक
यही
है
तिरे
क़रीं
होना
सारी
दुनिया
पे
हर्फ़
आएगा
इस
क़दर
भी
न
तुम
हसीं
होना
वाक़िआ'
कुछ
अजीब
लगता
है
तेरा
आना
मिरा
कहीं
होना
अच्छे
वक़्तों
की
इक
निशानी
है
दोस्तों
का
बहुत
नहीं
होना
ख़ुश
दिनों
में
तुम्हें
‘उमर-फ़रहत'
देखा
जाता
नहीं
हज़ीं
होना
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Umar Farhat
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उल्टी
तस्वीर
पहन
कर
निकले
अपनी
तक़दीर
पहन
कर
निकले
उस
को
देखा
था
बहुत
आँखों
ने
ख़्वाब
ता'बीर
पहन
कर
निकले
फ़स्ल-ए-गुल
आ
गई
तो
पाँव
में
हम
भी
ज़ंजीर
पहन
कर
निकले
शे'र
हम
ने
भी
बहुत
लिख
डाले
कैसी
तश्हीर
पहन
कर
निकले
हर
तरफ़
अपनी
अलम-दारी
है
कैसे
ये
तीर
पहन
कर
निकले
साथ
देने
को
बहत्तर
का
'उमर'
हम
भी
शमशीर
पहन
कर
निकले
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Umar Farhat
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है
कोई
और
भी
जहान
में
क्या
मैं
नहीं
हूँ
तिरे
गुमान
में
क्या
तू
ने
फ़ितराक
साथ
तो
रखा
तीर
भी
है
तिरी
कमान
में
क्या
एक
साया
था
दिल
में
वो
भी
बुझा
रह
गया
है
अब
इस
मकान
में
क्या
ज़ेर-ए-साया
है
और
सभी
दुनिया
हम
नहीं
हैं
तिरी
अमान
में
क्या
कोई
भी
तुझ
से
बात
करता
नहीं
ज़हर
सा
है
तिरी
ज़बान
में
क्या
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Umar Farhat
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