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Umar Farhat
aasmaañ ho ke bhi zameen hona
aasmaañ ho ke bhi zameen hona | आसमाँ हो के भी ज़मीं होना
- Umar Farhat
आसमाँ
हो
के
भी
ज़मीं
होना
इक
यही
है
तिरे
क़रीं
होना
सारी
दुनिया
पे
हर्फ़
आएगा
इस
क़दर
भी
न
तुम
हसीं
होना
वाक़िआ'
कुछ
अजीब
लगता
है
तेरा
आना
मिरा
कहीं
होना
अच्छे
वक़्तों
की
इक
निशानी
है
दोस्तों
का
बहुत
नहीं
होना
ख़ुश
दिनों
में
तुम्हें
‘उमर-फ़रहत'
देखा
जाता
नहीं
हज़ीं
होना
- Umar Farhat
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नहीं
दुनिया
को
जब
परवाह
हमारी
तो
फिर
दुनिया
की
परवाह
क्यूँँ
करें
हम
Jaun Elia
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बताऊँ
क्या
तुझे
ऐ
हम-नशीं
किस
से
मोहब्बत
है
मैं
जिस
दुनिया
में
रहता
हूँ
वो
इस
दुनिया
की
औरत
है
Asrar Ul Haq Majaz
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अपना
सब
कुछ
हार
के
लौट
आए
हो
न
मेरे
पास
मैं
तुम्हें
कहता
भी
रहता
था
कि
दुनिया
तेज़
है
Tehzeeb Hafi
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फ़न्न-ए-ग़ज़ल-आराई
दे
लहजे
को
सच्चाई
दे
दुनिया
है
जंगल
का
सफ़र
लछमन
जैसा
भाई
दे
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Tariq Shaheen
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एक
हमें
आवारा
कहना
कोई
बड़ा
इल्ज़ाम
नहीं
दुनिया
वाले
दिल
वालों
को
और
बहुत
कुछ
कहते
हैं
Habib Jalib
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दुनिया
के
ताने
सह
लेता
हूँ
इक
अच्छा
बेटा
कहलाना
है
Neeraj Neer
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मेरे
होंटों
पे
अपनी
प्यास
रख
दो
और
फिर
सोचो
कि
इस
के
बा'द
भी
दुनिया
में
कुछ
पाना
ज़रूरी
है
Waseem Barelvi
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मकाँ
तो
है
नहीं
जो
खींच
दें
दीवार
इस
दिल
में
कोई
दूजा
नहीं
रह
पाएगा
अब
यार
इस
दिल
में
जहाँ
भर
में
लुटाते
फिर
रहे
है
कम
नहीं
होता
तुम्हारे
वास्ते
इतना
रखा
था
प्यार
इस
दिल
में
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Bhaskar Shukla
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दुनिया
की
फ़िक्र
छोड़,
न
यूँँ
अब
उदास
बैठ
ये
वक़्त
रब
की
देन
है,
अम्मी
के
पास
बैठ
Salman Zafar
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जहाँ
इंसानियत
वहशत
के
हाथों
ज़ब्ह
होती
हो
जहाँ
तज़लील
है
जीना
वहाँ
बेहतर
है
मर
जाना
Gulzar Dehlvi
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जिस्म
सियाही
बनाऊँगा
तेरा
हर्फ़
सजाऊँगा
तू
बहता
पानी
बन
जा
मैं
मछली
बन
जाऊँगा
कल
मौसम
की
हथेली
पर
नाम
तिरा
खुदवाऊँगा
अपना
ग़ुबार
उड़ा
कर
मैं
कुछ
तस्वीर
बनाऊँगा
किसी
किवाड़
की
आड़
में
अब
तुझ
को
ला
के
छुपाऊँगा
तिरे
बदन
के
पानी
से
मैं
सूरज
चमकाऊँगा
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Umar Farhat
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है
कोई
और
भी
जहान
में
क्या
मैं
नहीं
हूँ
तिरे
गुमान
में
क्या
तू
ने
फ़ितराक
साथ
तो
रखा
तीर
भी
है
तिरी
कमान
में
क्या
एक
साया
था
दिल
में
वो
भी
बुझा
रह
गया
है
अब
इस
मकान
में
क्या
ज़ेर-ए-साया
है
और
सभी
दुनिया
हम
नहीं
हैं
तिरी
अमान
में
क्या
कोई
भी
तुझ
से
बात
करता
नहीं
ज़हर
सा
है
तिरी
ज़बान
में
क्या
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Umar Farhat
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इस
में
क्या
दलील
है
एक
संग-ए-मील
है
हँस
के
तोड़
दे
इसे
दर्द
की
फ़सील
है
शोहरतों
के
वास्ते
प्यास
ही
सबील
है
देखते
हैं
हर
तरफ़
क्या
कोई
अदील
है
जिस
का
नाम
है
'उमर'
वो
भी
बे-क़बील
है
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Umar Farhat
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सियह
चादर
में
लिपटा
है
फ़लक
से
चाँद
उतरा
है
नदी
में
डूबता
सूरज
कई
दिन
से
पिघलता
है
तुम्हारी
ज़ात
की
छत
पर
कोई
रस्सी
से
लटका
है
जगाओ
मत
उसे
'फ़रहत'
ये
उल्लू
शब
का
जागा
है
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Umar Farhat
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दीवार
फलाँग
कर
आया
सूरज
का
आधा
साया
नागिन
ने
पलट
पलट
कर
देर
तलक
मुझ
को
डराया
था
कोई
और
खंडर
में
जिस
ने
वो
चराग़
जलाया
कल
शब
पागल
हो
कर
वो
फिर
मेरे
तन
में
समाया
उस
के
तन
की
रेत
पे
क्या
मैं
ने
कुछ
ख़ाका
बनाया
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Umar Farhat
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