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Umar Farhat
is men kya daleel hai
is men kya daleel hai | इस में क्या दलील है
- Umar Farhat
इस
में
क्या
दलील
है
एक
संग-ए-मील
है
हँस
के
तोड़
दे
इसे
दर्द
की
फ़सील
है
शोहरतों
के
वास्ते
प्यास
ही
सबील
है
देखते
हैं
हर
तरफ़
क्या
कोई
अदील
है
जिस
का
नाम
है
'उमर'
वो
भी
बे-क़बील
है
- Umar Farhat
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और
भी
दुख
हैं
ज़माने
में
मोहब्बत
के
सिवा
राहतें
और
भी
हैं
वस्ल
की
राहत
के
सिवा
Faiz Ahmad Faiz
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ज़ख़्म
कहते
हैं
दिल
का
गहना
है
दर्द
दिल
का
लिबास
होता
है
Gulzar
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वो
रातें
चाँद
के
साथ
गईं
वो
बातें
चाँद
के
साथ
गईं
अब
सुख
के
सपने
क्या
देखें
जब
दुख
का
सूरज
सर
पर
हो
Ibn E Insha
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जिसकी
ख़ातिर
कितनी
रातें
सुलगाई
जिसके
दुख
में
दिल
जाने
क्यूँ
रोता
है
इक
दिन
हम
सेे
पूछ
रही
थी
वो
लड़की
प्यार
में
कोई
पागल
कैसे
होता
है
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Ritesh Rajwada
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इश्क़
से
तबीअत
ने
ज़ीस्त
का
मज़ा
पाया
दर्द
की
दवा
पाई
दर्द-ए-बे-दवा
पाया
Mirza Ghalib
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दिल
हिज्र
के
दर्द
से
बोझल
है
अब
आन
मिलो
तो
बेहतर
हो
इस
बात
से
हम
को
क्या
मतलब
ये
कैसे
हो
ये
क्यूँँकर
हो
Ibn E Insha
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दर्द
में
शिद्दत-ए-एहसास
नहीं
थी
पहले
ज़िंदगी
राम
का
बन-बास
नहीं
थी
पहले
Shakeel Azmi
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वो
सर
भी
काट
देता
तो
होता
न
कुछ
मलाल
अफ़्सोस
ये
है
उस
ने
मेरी
बात
काट
दी
Tahir Faraz
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आह
को
चाहिए
इक
उम्र
असर
होने
तक
कौन
जीता
है
तिरी
ज़ुल्फ़
के
सर
होने
तक
Mirza Ghalib
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हमारे
सैकड़ों
दुख
थे,
और
उस
में
एक
दुख
ये
भी
जो
हम
से
हो
के
गुज़रे
थे,
हमें
दीवार
कहते
थे
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Siddharth Saaz
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आसमाँ
से
उतरता
हुआ
एक
तारा
बुझाया
हुआ
आज
भी
रात
की
रानी
के
तन
से
है
नाग
लिपटा
हुआ
एक
पत्ता
किसी
शाख़
से
टूट
कर
आज
तन्हा
हुआ
काग़ज़ी
तन
है
उस
का
मगर
धूप
में
कब
से
झुलसा
हुआ
पहला
अक्षर
तिरे
नाम
का
रौशनी
से
है
लिक्खा
हुआ
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Umar Farhat
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आसमाँ
हो
के
भी
ज़मीं
होना
इक
यही
है
तिरे
क़रीं
होना
सारी
दुनिया
पे
हर्फ़
आएगा
इस
क़दर
भी
न
तुम
हसीं
होना
वाक़िआ'
कुछ
अजीब
लगता
है
तेरा
आना
मिरा
कहीं
होना
अच्छे
वक़्तों
की
इक
निशानी
है
दोस्तों
का
बहुत
नहीं
होना
ख़ुश
दिनों
में
तुम्हें
‘उमर-फ़रहत'
देखा
जाता
नहीं
हज़ीं
होना
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Umar Farhat
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है
कोई
और
भी
जहान
में
क्या
मैं
नहीं
हूँ
तिरे
गुमान
में
क्या
तू
ने
फ़ितराक
साथ
तो
रखा
तीर
भी
है
तिरी
कमान
में
क्या
एक
साया
था
दिल
में
वो
भी
बुझा
रह
गया
है
अब
इस
मकान
में
क्या
ज़ेर-ए-साया
है
और
सभी
दुनिया
हम
नहीं
हैं
तिरी
अमान
में
क्या
कोई
भी
तुझ
से
बात
करता
नहीं
ज़हर
सा
है
तिरी
ज़बान
में
क्या
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Umar Farhat
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सियह
चादर
में
लिपटा
है
फ़लक
से
चाँद
उतरा
है
नदी
में
डूबता
सूरज
कई
दिन
से
पिघलता
है
तुम्हारी
ज़ात
की
छत
पर
कोई
रस्सी
से
लटका
है
जगाओ
मत
उसे
'फ़रहत'
ये
उल्लू
शब
का
जागा
है
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उल्टी
तस्वीर
पहन
कर
निकले
अपनी
तक़दीर
पहन
कर
निकले
उस
को
देखा
था
बहुत
आँखों
ने
ख़्वाब
ता'बीर
पहन
कर
निकले
फ़स्ल-ए-गुल
आ
गई
तो
पाँव
में
हम
भी
ज़ंजीर
पहन
कर
निकले
शे'र
हम
ने
भी
बहुत
लिख
डाले
कैसी
तश्हीर
पहन
कर
निकले
हर
तरफ़
अपनी
अलम-दारी
है
कैसे
ये
तीर
पहन
कर
निकले
साथ
देने
को
बहत्तर
का
'उमर'
हम
भी
शमशीर
पहन
कर
निकले
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Umar Farhat
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