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Siraj Faisal Khan
zameen mere sajde se tharraa gaii
zameen mere sajde se tharraa gaii | ज़मीं मेरे सज्दे से थर्रा गई
- Siraj Faisal Khan
ज़मीं
मेरे
सज्दे
से
थर्रा
गई
मुझे
आसमाँ
से
पुकारा
गया
- Siraj Faisal Khan
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देख
तो
दिल
कि
जाँ
से
उठता
है
ये
धुआँ
सा
कहाँ
से
उठता
है
गोर
किस
दिलजले
की
है
ये
फ़लक
शोला
इक
सुब्ह
यां
से
उठता
है
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Meer Taqi Meer
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फ़लक
इतना
सूना
है
क्यूँ
ज़मीं
पर
तो
सब
मेरे
थे
Parul Singh "Noor"
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तू
शाहीं
है
परवाज़
है
काम
तेरा
तेरे
सामने
आसमाँ
और
भी
हैं
Allama Iqbal
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आसमाँ
से
गरज
छेड़ती
है
हमें
एक
बारिश
में
भी
भीगे
थे
साथ
हम
Parul Singh "Noor"
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मैं
घंटों
आसमाँ
में
देखता
था
ज़मीं
को
पीठ
के
नीचे
लगा
के
Siddharth Saaz
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वक़्त
आने
दे
दिखा
देंगे
तुझे
ऐ
आसमाँ
हम
अभी
से
क्यूँँ
बताएँ
क्या
हमारे
दिल
में
है
Bismil Azimabadi
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चाँद
को
देखकर
ये
लगता
है
तुम
मेरी
जान
आसमान
में
हो
Shajar Abbas
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चाहे
हो
आसमान
पे
चाहे
ज़मीं
पे
हो
वहशत
का
रक़्स
हम
ही
करेंगे
कहीं
पे
हो
दिल
पर
तुम्हारे
नाम
की
तख़्ती
लगी
न
थी
फिर
भी
ज़माना
जान
गया
तुम
यहीं
पे
हो
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Nirmal Nadeem
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वो
क़हर
था
कि
रात
का
पत्थर
पिघल
पड़ा
क्या
आतिशीं
गुलाब
खिला
आसमान
पर
Zafar Iqbal
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धूप
को
साया
ज़मीं
को
आसमाँ
करती
है
माँ
हाथ
रखकर
मेरे
सर
पर
सायबाँ
करती
है
माँ
मेरी
ख़्वाहिश
और
मेरी
ज़िद
उसके
क़दमों
पर
निसार
हाँ
की
गुंज़ाइश
न
हो
तो
फिर
भी
हाँ
करती
है
माँ
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Nawaz Deobandi
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त'अल्लुक़
तोड़
कर
उस
की
गली
से
कभी
मैं
जुड़
न
पाया
ज़िंदगी
से
ख़ुदा
का
आदमी
को
डर
कहाँ
अब
वो
घबराता
है
केवल
आदमी
से
मिरी
ये
तिश्नगी
शायद
बुझेगी
किसी
मेरी
ही
जैसी
तिश्नगी
से
बहुत
चुभता
है
ये
मेरी
अना
को
तुम्हारा
बात
करना
हर
किसी
से
ख़सारे
को
ख़सारे
से
भरूँगा
निकालूँगा
उजाला
तीरगी
से
तुम्हें
ऐ
दोस्तो
मैं
जानता
हूँ
सुकूँ
मिलता
है
मेरी
बेकली
से
हवाओं
में
कहाँ
ये
दम
था
'फ़ैसल'
दिया
मेरा
बुझा
है
बुज़दिली
से
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Siraj Faisal Khan
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तिरे
एहसास
में
डूबा
हुआ
मैं
कभी
सहरा
कभी
दरिया
हुआ
मैं
तिरी
नज़रें
टिकी
थीं
आसमाँ
पर
तिरे
दामन
से
था
लिपटा
हुआ
मैं
खुली
आँखों
से
भी
सोया
हूँ
अक्सर
तुम्हारा
रास्ता
तकता
हुआ
मैं
ख़ुदा
जाने
के
दलदल
में
ग़मों
के
कहाँ
तक
जाऊँगा
धँसता
हुआ
मैं
बहुत
पुर-ख़ार
थी
राह-ए-मोहब्बत
चला
आया
मगर
हँसता
हुआ
मैं
कई
दिन
बाद
उस
ने
गुफ़्तुगू
की
कई
दिन
बा'द
फिर
अच्छा
हुआ
मैं
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Siraj Faisal Khan
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उस
के
दिल
की
आग
ठंडी
पड़
गई
मुझ
को
शोहरत
मिल
गई
इल्ज़ाम
से
Siraj Faisal Khan
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ख़याल
कब
से
छुपा
के
ये
मन
में
रक्खा
है
मिरा
क़रार
तुम्हारे
बदन
में
रक्खा
है
Siraj Faisal Khan
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मैं
इस
ख़याल
से
शर्मिंदगी
में
डूब
गया
कि
मेरे
होते
हुए
वो
नदी
में
डूब
गया
Siraj Faisal Khan
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