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Shikha Pachouly
tu naahak hi ise jhuthla raha hai
tu naahak hi ise jhuthla raha hai | तू नाहक़ ही इसे झुठला रहा है
- Shikha Pachouly
तू
नाहक़
ही
इसे
झुठला
रहा
है
मोहब्बत
पर
कभी
पर्दा
रहा
है
अभी
रिश्ते
में
गुंजाइश
है
बाक़ी
अभी
वो
ग़लतियाँ
गिनवा
रहा
है
जहाँ
देखो
कोई
सूरज
का
टुकड़ा
किसी
बादल
से
धोखे
खा
रहा
था
जो
चाहे
तू
तो
रुक
कुछ
ख़्वाब
बुन
लें
तू
जल्दी
जा
अगर
तू
जा
रहा
है
उसे
अब
रोकना
मुमकिन
नहीं
है
वो
अपने
डर
से
आगे
जा
रहा
है
- Shikha Pachouly
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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सूरज
से
जंग
जीतने
निकले
थे
बेवक़ूफ़
सारे
सिपाही
मोम
के
थे
घुल
के
आ
गए
Rahat Indori
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तू
है
सूरज
तुझे
मालूम
कहाँ
रात
का
दुख
तू
किसी
रोज़
मेरे
घर
में
उतर
शाम
के
बाद
Farhat Abbas Shah
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रात
भर
ता'रीफ़
मैंने
की
तुम्हारे
रूप
की
चाँद
इतना
जल
गया
सुनकर
कि
सूरज
हो
गया
Chandan Rai
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बदला
जो
वक़्त
गहरी
रफ़ाक़त
बदल
गई
सूरज
ढला
तो
साए
की
सूरत
बदल
गई
इक
उम्र
तक
मैं
उसकी
ज़रूरत
बना
रहा
फिर
यूँँ
हुआ
कि
उसकी
ज़रूरत
बदल
गई
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Shaukat Fehmi
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सियाह
रात
नहीं
लेती
नाम
ढलने
का
यही
तो
वक़्त
है
सूरज
तिरे
निकलने
का
Shahryar
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ऐसी
सर्दी
है
कि
सूरज
भी
दुहाई
माँगे
जो
हो
परदेस
में
वो
किस
सेे
रज़ाई
माँगे
Rahat Indori
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मुझको
ऐसे
देख
रहा
हैरानी
में
जैसे
सूरज
देख
लिया
पेशानी
में
मैं
भी
उसको
देख
रहा
हूँ
कुछ
ऐसे
जैसे
सूरज
डूब
रहा
हो
पानी
में
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DEVANSH TIWARI
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वो
रातें
चाँद
के
साथ
गईं
वो
बातें
चाँद
के
साथ
गईं
अब
सुख
के
सपने
क्या
देखें
जब
दुख
का
सूरज
सर
पर
हो
Ibn E Insha
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अगर
साए
से
जल
जाने
का
इतना
ख़ौफ़
था
तो
फिर
सहर
होते
ही
सूरज
की
निगहबानी
में
आ
जाते
Azm Shakri
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सब
हदों
से
गुज़र
गई
हो
क्या
आज
फिर
उसके
घर
गई
हो
क्या
दफ़्न
हो
कर
भी
दिल
धड़कता
है
तुम
मोहब्बत
में
मर
गई
हो
क्या
आ
गई
फिर
से
मेरी
बातों
में
मुझको
डर
था
सुधर
गई
हो
क्या
राह
इक
ख़ुद
तलक
भी
आती
है
सच
बताना
उधर
गई
हो
क्या
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Shikha Pachouly
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कुछ
सुनाओ
कि
जी
नहीं
लगता
गुन
गुनाओ
कि
जी
नहीं
लगता
धड़कने
भी
ज़रा
तो
रक़्स
करें
पास
आओ
कि
जी
नहीं
लगता
मुझपे
हक़
है
तुम्हारा
जाने
जाँ
हक़
जताओ
कि
जी
नहीं
लगता
मुझ
सेे
इस्लाह
लो
रक़ीबों
पर
जी
जलाओ
कि
जी
नहीं
लगता
ख़ुद
को
कितना
मैं
तोड़
सकती
हूँ
आज़माओ
कि
जी
नहीं
लगता
अब
न
तारों
से
रात
मानेगी
चाँद
लाओ
कि
जी
नहीं
लगता
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Shikha Pachouly
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यही
हमको
गुमाँ
अक्सर
रहे
हैं
हमारे
नाम
वो
जाँ
कर
रहे
हैं
अभी
है
दौर-ए-आग़ाज़-ए-मोहब्बत
वो
मेरा
दिल
दुखाते
डर
रहे
हैं
वफ़ा
उनकी
तबीयत
में
नहीं
है
वो
कोशिश
तो
यक़ीनन
कर
रहे
हैं
मेरी
रुस्वाई
हो
जाए
न
ज़िंदा
वो
मेरा
नाम
लेकर
मर
रहे
हैं
करेंगे
शा'इरी
भी
अगले
दम
पर
अभी
तो
हम
मोहब्बत
कर
रहे
हैं
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Shikha Pachouly
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दिल
किसी
नूर
से
मुनव्वर
था
जब
तलक
इश्क़
मेरे
अंदर
था
मौसम-ए-वस्ल
में
ये
मायूसी
यार
इस
सेे
तो
हिज्र
बेहतर
था
रात
कहता
है
दूधिया
नज़्में
चाँद
दिन
में
उदास
शायर
था
दीन
पूछो
तो
हँसने
लगता
था
गाँव
में
मेरे
इक
कलंदर
था
वो
जहाँ
हौसले
ने
दम
तोड़ा
बस
उसी
मोड़
पे
मुक़द्दर
था
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Shikha Pachouly
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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