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Azm Shakri
agar saa.e se jal jaane ka itnaa khauf tha to phir
agar saa.e se jal jaane ka itnaa khauf tha to phir | अगर साए से जल जाने का इतना ख़ौफ़ था तो फिर
- Azm Shakri
अगर
साए
से
जल
जाने
का
इतना
ख़ौफ़
था
तो
फिर
सहर
होते
ही
सूरज
की
निगहबानी
में
आ
जाते
- Azm Shakri
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हुनर
से
काम
लिया
पेंट
ब्रश
नहीं
तोड़ा
बना
लिया
तेरे
जैसा
ही
कोई
रंगों
से
मुझे
ये
डर
है
कि
मिल
जाएगी
तो
रो
दूँगा
मैं
जिस
ख़ुशी
को
तरसता
रहा
हूँ
बरसों
से
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Rahul Gurjar
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डर
मुझे
मेरी
मुहब्बत
एक
दिन
खो
जाएगी
यार
मुझको
लग
रहा
वो
ग़ैर
की
हो
जाएगी
मैं
सभी
वादे
पुराने
ही
निभाते
जाऊँगा
और
वो
जाकर
किसी
की
बाँह
में
सो
जाएगी
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Ravi 'VEER'
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रुके
रुके
से
क़दम
रुक
के
बार
बार
चले
क़रार
दे
के
तिरे
दर
से
बे-क़रार
चले
Gulzar
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हमारे
जैसा
कोई
दर-ब-दर
नहीं
होगा
कहीं
पे
होगा
भी
तो
इस
कदर
नहीं
होगा
निकल
गया
हूँ
क़ज़ा
के
परे
तो
मैं
कबका
दे
जहर
भी
कोई
तो
अब
असर
नहीं
होगा
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Aadi Ratnam
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तुम
पर
इक
दिन
मरते
मरते
मर
जाना
है,
दीवाने
को
कहाँ
ख़बर
है
घर
जाना
है
एक
शब्द
तुमको
अंधेरे
का
खौफ़
दिलाकर,
बाद
में
ख़ुद
भी
जान
बूझकर
डर
जाना
है
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Vishal Singh Tabish
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गुज़ार
देते
हैं
रातें
पहलू
में
उसके
जुगनू
को
भी
दर
का
फ़क़ीर
बना
रखा
है
ALI ZUHRI
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नई
सुब्ह
पर
नज़र
है
मगर
आह
ये
भी
डर
है
ये
सहर
भी
रफ़्ता
रफ़्ता
कहीं
शाम
तक
न
पहुँचे
Shakeel Badayuni
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वो
कभी
आग़ाज़
कर
सकते
नहीं
ख़ौफ़
लगता
है
जिन्हें
अंजाम
से
Siraj Faisal Khan
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मुझे
ये
डर
है
तेरी
आरज़ू
न
मिट
जाए
बहुत
दिनों
से
तबीअत
मिरी
उदास
नहीं
Nasir Kazmi
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परिंद
क्यूँँ
मिरी
शाख़ों
से
ख़ौफ़
खाते
हैं
कि
इक
दरख़्त
हूँ
और
साया-दार
मैं
भी
हूँ
Asad Badayuni
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अजीब
हालत
है
जिस्म-ओ-जाँ
की
हज़ार
पहलू
बदल
रहा
हूँ
वो
मेरे
अंदर
उतर
गया
है
मैं
ख़ुद
से
बाहर
निकल
रहा
हूँ
Azm Shakri
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ये
जो
दीवार
अँधेरों
ने
उठा
रक्खी
है
मेरा
मक़्सद
इसी
दीवार
में
दर
करना
है
Azm Shakri
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मुझे
एक
लाश
कहकर
न
बहाओ
पानियों
में
मेरा
हाथ
छू
के
देखो
मेरी
नब्ज़
चल
रही
है
Azm Shakri
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मेरे
जिस्म
से
वक़्त
ने
कपड़े
नोच
लिए
मंज़र
मंज़र
ख़ुद
मेरी
पोशाक
हुआ
Azm Shakri
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जो
बच
गए
हैं
चराग़
उन
को
बचाए
रक्खो
मैं
जानता
हूँ
हवा
से
रिश्ता
बनाए
रक्खो
ज़रूर
उतरेगा
आसमाँ
से
कोई
सितारा
ज़मीन
वालो
ज़मीं
पे
पलकें
बिछाए
रक्खो
अभी
वहीं
से
किसी
के
ग़म
की
सदा
उठेगी
उसी
दरीचे
पे
कान
अपने
लगाए
रखो
हमेशा
ख़ुद
से
भी
पुर-तकल्लुफ़
रहो
तो
अच्छा
ख़ुद
अपने
अंदर
भी
एक
दीवार
उठाए
रक्खो
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Azm Shakri
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