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Azm Shakri
mujhe ek laash kahkar na bahao paaniyon men
mujhe ek laash kahkar na bahao paaniyon men | मुझे एक लाश कहकर न बहाओ पानियों में
- Azm Shakri
मुझे
एक
लाश
कहकर
न
बहाओ
पानियों
में
मेरा
हाथ
छू
के
देखो
मेरी
नब्ज़
चल
रही
है
- Azm Shakri
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बहुत
क़रीब
रही
है
ये
ज़िन्दगी
हम
से
बहुत
अज़ीज़
सही
ए'तिबार
कुछ
भी
नहीं
Akhtar Saeed Khan
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न
जाने
कैसी
महक
आ
रही
है
बस्ती
से
वही
जो
दूध
उबलने
के
बाद
आती
है
Munawwar Rana
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मुक़र्रर
दिन
नहीं
तो
लम्हा-ए-इमकान
में
आओ
अगर
तुम
मिल
नहीं
सकती
तो
मेरे
ध्यान
में
आओ
बला
की
ख़ूब-सूरत
लग
रही
हो
आज
तो
जानाँ
मुझे
इक
बात
कहनी
थी
तुम्हारे
कान
में..
आओ
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Darpan
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मंज़िल
पे
न
पहुँचे
उसे
रस्ता
नहीं
कहते
दो
चार
क़दम
चलने
को
चलना
नहीं
कहते
इक
हम
हैं
कि
ग़ैरों
को
भी
कह
देते
हैं
अपना
इक
तुम
हो
कि
अपनों
को
भी
अपना
नहीं
कहते
कम-हिम्मती
ख़तरा
है
समुंदर
के
सफ़र
में
तूफ़ान
को
हम
दोस्तो
ख़तरा
नहीं
कहते
बन
जाए
अगर
बात
तो
सब
कहते
हैं
क्या
क्या
और
बात
बिगड़
जाए
तो
क्या
क्या
नहीं
कहते
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Nawaz Deobandi
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सिवा
इसके
कुछ
अच्छा
ही
नहीं
लगता
है
शामों
में
सफ़र
कैसा
भी
हो
घर
को
परिंदे
लौट
जाते
हैं
Aarush Sarkaar
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मुझ
में
अब
मैं
नहीं
रही
बाक़ी
मैं
ने
चाहा
है
इस
क़दर
तुम
को
Ambreen Haseeb Ambar
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बंद
कमरे
में
हज़ारों
मील
अब
चलते
हैं
हम
काफ़ी
महँगी
पड़
रही
है
शा'इरी
से
दोस्ती
Ashraf Jahangeer
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न
हम-सफ़र
न
किसी
हम-नशीं
से
निकलेगा
हमारे
पाँव
का
काँटा
हमीं
से
निकलेगा
Rahat Indori
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ज़हीफ़ी
इस
लिए
मुझको
सुहानी
लग
रही
है
इसे
कमाने
में
पूरी
जवानी
लग
रही
है
नतीजा
ये
है
कि
बरसों
तलाश-ए-ज़ात
के
बाद
वहाँ
खड़ा
हूँ
जहाँ
रेत
पानी
लग
रही
है
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Khalid Sajjad
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अभी
से
पाँव
के
छाले
न
देखो
अभी
यारो
सफ़र
की
इब्तिदा
है
Ejaz Rahmani
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जो
बच
गए
हैं
चराग़
उनको
बचाये
रक्खो
मैं
चाहता
हूँ
हवा
से
रिश्ता
बनाये
रक्खो
Azm Shakri
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ज़ख़्म
जो
तुम
ने
दिया
वो
इस
लिए
रक्खा
हरा
ज़िंदगी
में
क्या
बचेगा
ज़ख़्म
भर
जाने
के
बाद
Azm Shakri
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आँसुओं
से
लिख
रहे
हैं
बेबसी
की
दास्ताँ
लग
रहा
है
दर्द
की
तस्वीर
बन
जाएँगे
हम
Azm Shakri
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मुसलसल
हँस
रहा
हूँ
गा
रहा
हूँ
तिरी
यादों
से
दिल
बहला
रहा
हूँ
तिरी
यादों
की
बेलें
जल
गईं
सब
मैं
फूलों
की
तरह
मुरझा
रहा
हूँ
ऐ
मेरी
वहशतो
सहरा
की
जानिब
मुझे
आवाज़
दो
मैं
आ
रहा
हूँ
किनारे
मेरी
जानिब
बढ़
रहे
हैं
मगर
मैं
हूँ
कि
डूबा
जा
रहा
हूँ
यहाँ
झूटों
के
तम्ग़े
मिल
रहे
हैं
मैं
सच्चा
हूँ
तो
परखा
जा
रहा
हूँ
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Azm Shakri
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लाखों
सद
में
ढेरों
ग़म
फिर
भी
नहीं
हैं
आँखें
नम
इक
मुद्दत
से
रोए
नहीं
क्या
पत्थर
के
हो
गए
हम
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Azm Shakri
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