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Azm Shakri
musalsal hañs raha hooñ ga raha hooñ
musalsal hañs raha hooñ ga raha hooñ | मुसलसल हँस रहा हूँ गा रहा हूँ
- Azm Shakri
मुसलसल
हँस
रहा
हूँ
गा
रहा
हूँ
तिरी
यादों
से
दिल
बहला
रहा
हूँ
तिरी
यादों
की
बेलें
जल
गईं
सब
मैं
फूलों
की
तरह
मुरझा
रहा
हूँ
ऐ
मेरी
वहशतो
सहरा
की
जानिब
मुझे
आवाज़
दो
मैं
आ
रहा
हूँ
किनारे
मेरी
जानिब
बढ़
रहे
हैं
मगर
मैं
हूँ
कि
डूबा
जा
रहा
हूँ
यहाँ
झूटों
के
तम्ग़े
मिल
रहे
हैं
मैं
सच्चा
हूँ
तो
परखा
जा
रहा
हूँ
- Azm Shakri
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अब
उस
के
दर
से
भी
आवाज़
आती
है
कि
नहीं
बता
रे
ज़िन्दगी
तू
बाज़
आती
है
कि
नहीं
बहकने
लगता
है
जब
जब
किसी
के
प्यार
में
दिल
तो
तेरी
याद
यूँंँ
आके
डराती
है
कि
नहीं
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Faiz Ahmad
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मिरी
ख़ामोशियों
की
झील
में
फिर
किसी
आवाज़
का
पत्थर
गिरा
है
Aadil Raza Mansoori
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तेरी
आवाज़
मेरा
रिज़्क
हुआ
करती
थी
तू
मुझे
भूख
से
मारेगा
ये
सोचा
नहीं
था
Rafi Raza
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भटकती
फिर
रही
है
आँख
घर
में
तिरी
आवाज़
इसको
दिख
रही
है
Himanshu Kiran Sharma
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जब
उसने
पलट
कर
नहीं
देखा
तो
ये
जाना
आवाज़
लगाने
में
भी
नुक़सान
बहुत
है
Imtiyaz Khan
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लहजा
कि
जैसे
सुब्ह
की
ख़ुश्बू
अज़ान
दे
जी
चाहता
है
मैं
तिरी
आवाज़
चूम
लूँ
Bashir Badr
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मोहब्बत
कर
मोहब्बत
कर
यही
बस
कह
रहा
है
दिल
सुन
अपने
दिल
की
तू
ये
ग़ैर
की
आवाज़
थोड़ी
है
Krishnakant Kabk
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शब
भर
इक
आवाज़
बनाई
सुब्ह
हुई
तो
चीख़
पड़े
रोज़
का
इक
मामूल
है
अब
तो
ख़्वाब-ज़दा
हम
लोगों
का
Abhishek shukla
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तिरी
सदा
का
है
सदियों
से
इंतिज़ार
मुझे
मिरे
लहू
के
समुंदर
ज़रा
पुकार
मुझे
Khalilur Rahman Azmi
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हमको
बस
आवाज़
लगानी
होती
है
पीछे
मुड़ना
काम
तुम्हारा
रहता
है
Anurag Pandey
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जो
बच
गए
हैं
चराग़
उन
को
बचाए
रक्खो
मैं
जानता
हूँ
हवा
से
रिश्ता
बनाए
रक्खो
ज़रूर
उतरेगा
आसमाँ
से
कोई
सितारा
ज़मीन
वालो
ज़मीं
पे
पलकें
बिछाए
रक्खो
अभी
वहीं
से
किसी
के
ग़म
की
सदा
उठेगी
उसी
दरीचे
पे
कान
अपने
लगाए
रखो
हमेशा
ख़ुद
से
भी
पुर-तकल्लुफ़
रहो
तो
अच्छा
ख़ुद
अपने
अंदर
भी
एक
दीवार
उठाए
रक्खो
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Azm Shakri
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आज
की
रात
दिवाली
है
दिए
रौशन
हैं
आज
की
रात
ये
लगता
है
मैं
सो
सकता
हूँ
Azm Shakri
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ये
जो
दीवार
अँधेरों
ने
उठा
रक्खी
है
मेरा
मक़्सद
इसी
दीवार
में
दर
करना
है
Azm Shakri
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ज़िन्दगी,
यूँँ
भी
गुज़ारी
जा
रही
है
जैसे,
कोई
जंग
हारी
जा
रही
है
जिस
जगह
पहले
से
ज़ख़्मों
के
निशां
थे
फिर
वहीं
पे
चोट
मारी
जा
रही
है
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Azm Shakri
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ज़िंदगी
यूँँ
भी
गुज़ारी
जा
रही
है
जैसे
कोई
जंग
हारी
जा
रही
है
जिस
जगह
पहले
के
ज़ख़्मों
के
निशाँ
में
फिर
वहीं
पर
चोट
मारी
जा
रही
है
वक़्त-ए-रुख़्सत
आब-दीदा
आप
क्यूँँ
हैं
जिस्म
से
तो
जाँ
हमारी
जा
रही
है
बोल
कर
ता'रीफ़
में
कुछ
लफ़्ज़
उस
की
शख़्सियत
अपनी
निखारी
जा
रही
है
धूप
के
दस्ताने
हाथों
में
पहन
कर
बर्फ़
की
चादर
उतारी
जा
रही
है
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Azm Shakri
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