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Sandeep dabral 'sendy'
churakar bazm men nazrein vo raani dhoondhte apni
churakar bazm men nazrein vo raani dhoondhte apni | चुराकर बज़्म में नज़रें वो रानी ढूँढ़ते अपनी
- Sandeep dabral 'sendy'
चुराकर
बज़्म
में
नज़रें
वो
रानी
ढूँढ़ते
अपनी
मोहब्बत
में
गँवाई
वो
जवानी
ढूँढ़ते
अपनी
- Sandeep dabral 'sendy'
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पत्थर
के
इस
जहाँ
में
थी
रोने
लगी
सभा
जब
आदमी
ने
आदमी
को
आदमी
कहा
SHIV SAFAR
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ये
उसकी
मेहरबानी
है
वो
घर
में
ही
सँवरती
है
निकल
आए
जो
महफ़िल
में
तो
क़त्ल-ए-आम
हो
जाए
Ashraf Jahangeer
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तिरे
बग़ैर
अजब
बज़्म-ए-दिल
का
आलम
है
चराग़
सैंकड़ों
जलते
हैं
रौशनी
कम
है
Shakeel Badayuni
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बात
करनी
मुझे
मुश्किल
कभी
ऐसी
तो
न
थी
जैसी
अब
है
तेरी
महफ़िल
कभी
ऐसी
तो
न
थी
Bahadur Shah Zafar
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मुतअस्सिर
हैं
यहाँ
सब
लोग
जाने
क्या
समझते
हैं
नहीं
जो
यार
शबनम
भी
उसे
दरिया
समझते
हैं
हक़ीक़त
सारी
तेरी
मैं
बता
तो
दूँ
सर-ए-महफ़िल
मगर
ये
लोग
सारे
जो
तुझे
अच्छा
समझते
हैं
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Nirvesh Navodayan
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चराग़
घर
का
हो
महफ़िल
का
हो
कि
मंदिर
का
हवा
के
पास
कोई
मसलहत
नहीं
होती
Waseem Barelvi
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मुझे
अँधेरे
से
बात
करनी
है
सो
करा
दो,
दिया
बुझा
दो
कुछ
एक
लम्हों
को
रौशनी
का
गला
दबा
दो,
दिया
बुझा
दो
रिवाज़-ए-महफ़िल
निभा
रहा
हूँ
बता
रहा
हूँ
मैं
जा
रहा
हूँ
मुझे
विदा
दो,
जो
रोना
चाहे
उन्हें
बुला
दो,
दिया
बुझा
दो
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Vikram Gaur Vairagi
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दूर
हूँ
लेकिन
बता
सकता
हूँ
उन
की
बज़्म
में
क्या
हुआ
क्या
हो
रहा
है
और
क्या
होने
को
है
Shakeel Badayuni
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शोर
की
इस
भीड़
में
ख़ामोश
तन्हाई
सी
तुम
ज़िन्दगी
है
धूप
तो
मद-मस्त
पुर्वाई
सी
तुम
चाहे
महफ़िल
में
रहूँ
चाहे
अकेले
में
रहूँ
गूँजती
रहती
हो
मुझ
में
शोख़
शहनाई
सी
तुम
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Kunwar Bechain
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मैं
तुझे
बज़्म
में
लाऊँगा
मेरी
जान
मगर
लोग
जब
दूसरे
चेहरों
पे
फ़िदा
हो
जाएँ
Ashu Mishra
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उसके
छूने
से
मुरझाया
गुल
ताज़ा
हो
जाए
हो
जाए
संग
खड़े
जिसके
वो
राजा
हो
जाए
चलने
लग
जाए
यार
सबा
भी
उसकी
ही
जानिब
गर
उसके
आने
का
उसको
अंदाज़ा
हो
जाए
बस
उसकी
एक
झलक
दिख
जाए
तो
दिन
बन
जाए
उस
ख़ातिर
फिर
चाहे
कितना
ख़म्याज़ा
हो
जाए
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Sandeep dabral 'sendy'
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पल
एक
नहीं
लगता
है
गगरी
को
आधा
होने
में
कि
बिगड़
जाती
हैं
बातें
भी
अक्सर
ज़्यादा
होने
में
Sandeep dabral 'sendy'
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रुख़सार,
जबीं
हर
बार
नज़र
खींचे
अपनी
ओर
मैं
तिल
को
नुक्ता
बिंदी
को
महताब
लिखूँगा
Sandeep dabral 'sendy'
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बैठ
तन्हा
बख़्त
का
रोना
न
रोते
हम
यहाँ
पर
गर
लकीरों
से
लकीरें
हाथ
की
मिलती
हमारी
Sandeep dabral 'sendy'
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कभी-कभार
तुम
मिज़ाज
पढ़
लिया
करो
मिरा
अगर
बयाँ
ही
करना
है
तो
चुप्पी
है
न
काम
की
Sandeep dabral 'sendy'
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