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Rudransh Trigunayat
shaam hote hi ghar jaana padta hai
shaam hote hi ghar jaana padta hai | शाम होते ही घर जाना पड़ता है
- Rudransh Trigunayat
शाम
होते
ही
घर
जाना
पड़ता
है
एक
दिन
सबको
मर
जाना
पड़ता
है
ख़्वाब
में
वो
मुझ
पर
ग़ुस्सा
करती
है
सो
हमें
सच
में
डर
जाना
पड़ता
है
- Rudransh Trigunayat
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जाने
से
कोई
फ़र्क़
ही
उसके
नहीं
पड़ा
क्या
क्या
समझ
रहा
था
बिछड़ने
के
डर
को
मैं
Shariq Kaifi
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मज़ा
चहिए
जो
आख़िर
तक
उदासी
से
मोहब्बत
कर
ख़ुशी
का
क्या
है
कब
तब्दील
है
से
थी
में
हो
जाए
Atul K Rai
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आ
जाए
कौन
कब
कहाँ
कैसी
ख़बर
के
साथ
अपने
ही
घर
में
बैठा
हुआ
हूँ
मैं
डर
के
साथ
Pratap Somvanshi
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कोई
ख़ुद-कुशी
की
तरफ़
चल
दिया
उदासी
की
मेहनत
ठिकाने
लगी
Adil Mansuri
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भूचाल
की
धमकी
का
अगर
डर
है
तो
लोगों
इन
कच्चे
मकानों
को
गिरा
क्यूँ
नहीं
देते
Gyan Prakash Vivek
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मैं
कैसे
मान
लूँ
कि
इश्क़
बस
इक
बार
होता
है
तुझे
जितनी
दफ़ा
देखूँ
मुझे
हर
बार
होता
है
तुझे
पाने
की
हसरत
और
डर
ना-कामियाबी
का
इन्हीं
दो
तीन
बातों
से
ये
दिल
दो
चार
होता
है
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Bhaskar Shukla
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तन्हाई
ये
तंज
करे
है
तन्हा
क्यूँ
है
यार
कहाँ
है
आगे
पीछे
चलने
वाले
Vishal Singh Tabish
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मुझ
ऐसा
शख़्स
अगर
क़हक़हों
से
भर
जाए
ये
साँस
लेती
उदासी
तो
घुट
के
मर
जाए
वो
मेरे
बाद
तरस
जाएगा
मोहब्बत
को
उसे
ये
कहना
अगर
हो
सके
तो
मर
जाए
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Rakib Mukhtar
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ये
जो
दीवार
अँधेरों
ने
उठा
रक्खी
है
मेरा
मक़्सद
इसी
दीवार
में
दर
करना
है
Azm Shakri
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ख़मोशी
तो
यही
बतला
रही
है
उदासी
रास
मुझको
आ
रही
है
मुझे
जिन
ग़लतियों
से
सीखना
था
वही
फिर
ज़िंदगी
दोहरा
रही
है
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Vishal Singh Tabish
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उसने
इतना
सँभाल
कर
रखा
है
मुझको
पल्लू
सा
डाल
कर
रखा
है
Rudransh Trigunayat
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नहीं
है
साथ
में
तो
क्या
हुआ
है
ज़रा
सा
इश्क़
में
घाटा
हुआ
है
मुझे
धोखा
वो
देकर
कह
रही
है
सनम
जो
भी
हुआ
अच्छा
हुआ
है
रखे
थे
नाम
बच्चों
के
हमारे
ख़बर
ये
है
जिसे
बेटा
हुआ
है
कोई
था
तोड़ने
की
ज़िद
में
रिश्ता
किसी
ने
हाथ
को
पकड़ा
हुआ
है
बड़ी
दाढ़ी
बड़े
बालों
से
समझो
मुहब्बत
ने
मुझे
खाया
हुआ
है
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Rudransh Trigunayat
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ज़ख़्म
खाए
हुए
पुराने
,पर
लौट
आए
मगर
बुलाने
पर
वो
भटकती
बग़ैर
यादों
के
है
ख़ुशी
आ
गई
ठिकाने
पर
लौट
चलते
मगर
कहाँ
जाएँ
याद
जाती
नहीं
भुलाने
पर
कोशिशें
रायगाँ
हुईं
मेरी
तुम
नहीं
आ
सकी
बुलाने
पर
नौकरी
कर
रहे
दिनों
दिन
हम
जल
गए
लोग
मुस्कुराने
पर
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मुझे
तुम
पर
कोई
ग़ुस्सा
नहीं
है
तुम्हें
वो
छू
गया
अच्छा
नहीं
है
मैं
माँ
से
था
मिलाने
को
तुम्हें,
पर
तुम्हारा
इश्क़
भी
सच्चा
नहीं
है
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Rudransh Trigunayat
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मैं
हूँ
नाकाम
लड़का
और
फिर
नाकाम
भी
इतना
न
मैंने
नौकरी
पाई
न
वो
सहमत
हुई
मुझ
सेे
Rudransh Trigunayat
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