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Rakib Mukhtar
mujh aisa shaKHs agar qahqahon se bhar jaa.e
mujh aisa shaKHs agar qahqahon se bhar jaa.e | मुझ ऐसा शख़्स अगर क़हक़हों से भर जाए
- Rakib Mukhtar
मुझ
ऐसा
शख़्स
अगर
क़हक़हों
से
भर
जाए
ये
साँस
लेती
उदासी
तो
घुट
के
मर
जाए
वो
मेरे
बाद
तरस
जाएगा
मोहब्बत
को
उसे
ये
कहना
अगर
हो
सके
तो
मर
जाए
- Rakib Mukhtar
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इक
लफ़्ज़-ए-मोहब्बत
का
अदना
ये
फ़साना
है
सिमटे
तो
दिल-ए-आशिक़
फैले
तो
ज़माना
है
Jigar Moradabadi
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लिख
दिया
था
जिल्द
पर
ईसा
का
नाम
साँस
लेने
लग
गए
औराक़
सब
Kiran K
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हद
से
ज़्यादा
भी
प्यार
मत
करना
जी
हर
इक
पे
निसार
मत
करना
क्या
ख़बर
किस
जगह
पे
रुक
जाए
साँस
का
एतिबार
मत
करना
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Qamar Ejaz
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निभाया
जिस
सेे
भी
रिश्ता
तो
फिर
हद
में
रहे
हैं
हम
किसी
के
मखमली
तकिए
के
ऊपर
सर
नहीं
रक्खा
Nirbhay Nishchhal
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अपना
रिश्ता
ज़मीं
से
ही
रक्खो
कुछ
नहीं
आसमान
में
रक्खा
Jaun Elia
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ज़िंदगी
तुझ
से
हर
इक
साँस
पे
समझौता
करूँँ
शौक़
जीने
का
है
मुझ
को
मगर
इतना
भी
नहीं
Muzaffar Warsi
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तुम्हारा
प्यार
तो
साँसों
में
साँस
लेता
है
जो
होता
नश्शा
तो
इक
दिन
उतर
नहीं
जाता
Waseem Barelvi
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उस
लड़की
से
बस
अब
इतना
रिश्ता
है
मिल
जाए
तो
बात
वगैरा
करती
है
बारिश
मेरे
रब
की
ऐसी
नेमत
है
रोने
में
आसानी
पैदा
करती
है
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Tehzeeb Hafi
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इतना
धीरे-धीरे
रिश्ता
ख़त्म
हुआ
बहुत
दिनों
तक
लगा
नहीं
हम
बिछड़े
हैं
Ajmal Siddiqui
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हमारा
ख़ून
का
रिश्ता
है
सरहदों
का
नहीं
हमारे
ख़ून
में
गँगा
भी
चनाब
भी
है
Kanval Ziai
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शाख़-ए-उम्मीद
से
कड़वा
भी
उतर
सकता
हूँ
रोज़
ये
बात
मुझे
सब्र
का
फल
कहता
है
Rakib Mukhtar
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दिलासा
देते
हुए
लोग
क्या
समझ
पाते
हम
एक
शख़्स
नहीं
काएनात
हारे
थे
Rakib Mukhtar
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ये
रिज़्क़-ए-अश्क
फ़राहम
बहम
किया
जाए
हमारी
आँख
पे
रहम-ओ-करम
किया
जाए
मुरीदनी
के
दुपट्टे
की
सम्त
लपका
था
जनाब-ए-पीर
का
बाज़ू
क़लम
किया
जाए
वो
इतना
ढ़ेर
हसीं
था
कि
हम
पे
वाजिब
है
तमाम
उम्र
बिछड़ने
का
ग़म
किया
जाए
ज़मीं
को
अर्श-ए-मुअल्ला
तलक
रिसाई
मिले
फ़लक
को
खींच
के
मिट्टी
में
ज़म
किया
जाए
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Rakib Mukhtar
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हुक्म-ए-मुर्शिद
पे
ही
जी
उठना
है
मर
जाना
है
इश्क़
जिस
सम्त
भी
ले
जाए
उधर
जाना
है
लड़खड़ाता
हूँ
तो
वो
रो
के
लिपट
जाता
है
मैंने
गिरना
है
तो
उस
शख़्स
ने
मर
जाना
है
उसकी
छाँव
में
भी
थक
कर
नहीं
बैठा
जाता
तूने
जिस
पेड़
को
फलदार
शजर
जाना
है
ख़ुश्क
मश्कीज़ा
लिए
ख़ाली
पलटना
है
उसे
और
दरियाओं
का
शीराज़ा
बिखर
जाना
है
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Rakib Mukhtar
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वो
इतना
ढेर
हसीं
था
कि
हम
पे
वाजिब
है
तमाम
उम्र
बिछड़ने
का
ग़म
किया
जाए
Rakib Mukhtar
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