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Rakib Mukhtar
dilaasa dete hue log kya samajh paate
dilaasa dete hue log kya samajh paate | दिलासा देते हुए लोग क्या समझ पाते
- Rakib Mukhtar
दिलासा
देते
हुए
लोग
क्या
समझ
पाते
हम
एक
शख़्स
नहीं
काएनात
हारे
थे
- Rakib Mukhtar
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लम्स
उसका
इस
क़दर
महसूस
होता
है
मुझे
हो
कोई
नाराज़
तितली
फूल
पर
बैठी
हुई
फ़िल्म
में
शायद
बिछड़ने
का
कोई
अब
सीन
है
और
मेरे
हाथ
को
वो
थाम
कर
बैठी
हुई
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Sunny Seher
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जिस्म
के
पार
जाना
पड़ा
था
कभी
इश्क़
कर
के
हुई
बंदगी
की
समझ
Neeraj Neer
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उसे
महसूस
भी
होने
न
दूँगा
कि
उसके
प्यार
में
मैं
मर
चुका
हूँ
Umesh Maurya
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देख
कर
हर
कोई
बेकार
समझ
ले
मुझ
को
अपनी
उल्फ़त
में
गिरफ़्तार
समझ
ले
मुझ
को
बिना
उसके
तिरी
जन्नत
मुझे
मंज़ूर
नहीं
तू
मिरी
मान
गुनहगार
समझ
ले
मुझ
को
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Faiz Ahmad
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लाई
है
किस
मक़ाम
पे
ये
ज़िंदगी
मुझे
महसूस
हो
रही
है
ख़ुद
अपनी
कमी
मुझे
Ali Ahmad Jalili
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दोनों
हाथों
को
तेरे
हाथ
समझ
कर
जानाँ
अपने
गालों
पे
ख़ुद
ही
रंग
लगाया
मैंने
Upendra Bajpai
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ख़ुद
को
इतना
जो
हवा-दार
समझ
रक्खा
है
क्या
हमें
रेत
की
दीवार
समझ
रक्खा
है
Haseeb Soz
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हमें
हर
वक़्त
ये
एहसास
दामन-गीर
रहता
है
पड़े
हैं
ढेर
सारे
काम
और
मोहलत
ज़रा
सी
है
Khurshid Talab
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ये
नहीं
है
कि
वो
एहसान
बहुत
करता
है
अपने
एहसान
का
एलान
बहुत
करता
है
आप
इस
बात
को
सच
ही
न
समझ
लीजिएगा
वो
मेरी
जान
मेरी
जान
बहुत
करता
है
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Jawwad Sheikh
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उनकी
सोहबत
में
गए
सँभले
दोबारा
टूटे
हम
किसी
शख़्स
को
दे
दे
के
सहारा
टूटे
ये
अजब
रस्म
है
बिल्कुल
न
समझ
आई
हमें
प्यार
भी
हम
ही
करें
दिल
भी
हमारा
टूटे
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Vikram Gaur Vairagi
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मुझ
ऐसा
शख़्स
अगर
क़हक़हों
से
भर
जाए
ये
साँस
लेती
उदासी
तो
घुट
के
मर
जाए
वो
मेरे
बाद
तरस
जाएगा
मोहब्बत
को
उसे
ये
कहना
अगर
हो
सके
तो
मर
जाए
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Rakib Mukhtar
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ये
रिज़्क़-ए-अश्क
फ़राहम
बहम
किया
जाए
हमारी
आँख
पे
रहम-ओ-करम
किया
जाए
मुरीदनी
के
दुपट्टे
की
सम्त
लपका
था
जनाब-ए-पीर
का
बाज़ू
क़लम
किया
जाए
वो
इतना
ढ़ेर
हसीं
था
कि
हम
पे
वाजिब
है
तमाम
उम्र
बिछड़ने
का
ग़म
किया
जाए
ज़मीं
को
अर्श-ए-मुअल्ला
तलक
रिसाई
मिले
फ़लक
को
खींच
के
मिट्टी
में
ज़म
किया
जाए
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Rakib Mukhtar
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शाख़-ए-उम्मीद
से
कड़वा
भी
उतर
सकता
हूँ
रोज़
ये
बात
मुझे
सब्र
का
फल
कहता
है
Rakib Mukhtar
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हुक्म-ए-मुर्शिद
पे
ही
जी
उठना
है
मर
जाना
है
इश्क़
जिस
सम्त
भी
ले
जाए
उधर
जाना
है
लड़खड़ाता
हूँ
तो
वो
रो
के
लिपट
जाता
है
मैंने
गिरना
है
तो
उस
शख़्स
ने
मर
जाना
है
उसकी
छाँव
में
भी
थक
कर
नहीं
बैठा
जाता
तूने
जिस
पेड़
को
फलदार
शजर
जाना
है
ख़ुश्क
मश्कीज़ा
लिए
ख़ाली
पलटना
है
उसे
और
दरियाओं
का
शीराज़ा
बिखर
जाना
है
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Rakib Mukhtar
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ये
सानेहा
भी
हुआ
है
तेरी
ख़ुदाई
में
तलाक़
दी
गई
दुल्हन
को
मुँह
दिखाई
में
ये
और
बात
कि
हम
माँगते
नहीं
वर्ना
हमारा
हिस्सा
है
दुनिया
की
पाई
पाई
में
शदीद
ग़ुस्से
में
सतरंगी
चूड़ियों
के
साथ
हमारा
दिल
भी
है
टूटा
तेरी
कलाई
में
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Rakib Mukhtar
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