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Rakib Mukhtar
ye saanehaa bhi hua hai teri khudaai men
ye saanehaa bhi hua hai teri khudaai men | ये सानेहा भी हुआ है तेरी ख़ुदाई में
- Rakib Mukhtar
ये
सानेहा
भी
हुआ
है
तेरी
ख़ुदाई
में
तलाक़
दी
गई
दुल्हन
को
मुँह
दिखाई
में
ये
और
बात
कि
हम
माँगते
नहीं
वर्ना
हमारा
हिस्सा
है
दुनिया
की
पाई
पाई
में
शदीद
ग़ुस्से
में
सतरंगी
चूड़ियों
के
साथ
हमारा
दिल
भी
है
टूटा
तेरी
कलाई
में
- Rakib Mukhtar
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इस
त'अल्लुक़
में
नहीं
मुमकिन
तलाक़
ये
मोहब्बत
है
कोई
शादी
नहीं
Anwar Shaoor
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तुम
भी
शादी
करके
हमको
भूल
गई
हम
भी
नाम
कमाने
में
मसरूफ़
हुए
Tanoj Dadhich
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इसलिए
ये
महीना
ही
शामिल
नहीं
उम्र
की
जंत्री
में
हमारी
उसने
इक
दिन
कहा
था
कि
शादी
है
इस
फरवरी
में
हमारी
Tehzeeb Hafi
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मसाइल
तो
बहुत
से
हैं
मगर
बस
एक
ही
हल
है
सहरस
शाम
तक
सर
मेरा
है
बेगम
की
चप्पल
है
मेरे
मालिक
भला
इस
सेे
बुरी
भी
क्या
सज़ा
होगी
मेरा
शादीशुदा
होना
ही
दोज़ख़
की
रिहर्सल
है
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Paplu Lucknawi
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बीस
बरस
तक
बाप
उधड़ता
है
थोड़ा
थोड़ा
तब
सिलता
है
इक
बेटी
की
शादी
का
जोड़ा
Tanoj Dadhich
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पहले
थोड़ी
मुश्किल
होगी
आगे
लेकिन
मंज़िल
होगी
सब
बाराती
शायर
होंगे
मेरी
शादी
महफ़िल
होगी
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Tanoj Dadhich
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वो
शादी
तो
करेगी
मगर
एक
शर्त
पर
हम
हिज्र
में
रहेंगे
अगर
नौकरी
नहीं
Harsh saxena
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भुला
के
दूल्हा
जिसे
बैठता
है
मंडप
में
वो
चेहरा
आख़िरी
फेरे
में
याद
आता
है
Shanawar Kiratpuri
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क्या
जाने
किस
ख़ता
की
सज़ा
दी
गई
हमें
रिश्ता
हमारा
दार
पे
लटका
दिया
गया
शादी
में
सब
पसंद
का
लाया
गया
मगर
अपनी
पसंद
का
उसे
दूल्हा
नहीं
मिला
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Afzal Ali Afzal
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रुक
गया
है
वो
या
चल
रहा
है
हमको
सब
कुछ
पता
चल
रहा
है
उसने
शादी
भी
की
है
किसी
से
और
गाँव
में
क्या
चल
रहा
है
Tehzeeb Hafi
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ये
रिज़्क़-ए-अश्क
फ़राहम
बहम
किया
जाए
हमारी
आँख
पे
रहम-ओ-करम
किया
जाए
मुरीदनी
के
दुपट्टे
की
सम्त
लपका
था
जनाब-ए-पीर
का
बाज़ू
क़लम
किया
जाए
वो
इतना
ढ़ेर
हसीं
था
कि
हम
पे
वाजिब
है
तमाम
उम्र
बिछड़ने
का
ग़म
किया
जाए
ज़मीं
को
अर्श-ए-मुअल्ला
तलक
रिसाई
मिले
फ़लक
को
खींच
के
मिट्टी
में
ज़म
किया
जाए
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Rakib Mukhtar
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मुझ
ऐसा
शख़्स
अगर
क़हक़हों
से
भर
जाए
ये
साँस
लेती
उदासी
तो
घुट
के
मर
जाए
वो
मेरे
बाद
तरस
जाएगा
मोहब्बत
को
उसे
ये
कहना
अगर
हो
सके
तो
मर
जाए
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Rakib Mukhtar
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हुक्म-ए-मुर्शिद
पे
ही
जी
उठना
है
मर
जाना
है
इश्क़
जिस
सम्त
भी
ले
जाए
उधर
जाना
है
लड़खड़ाता
हूँ
तो
वो
रो
के
लिपट
जाता
है
मैंने
गिरना
है
तो
उस
शख़्स
ने
मर
जाना
है
उसकी
छाँव
में
भी
थक
कर
नहीं
बैठा
जाता
तूने
जिस
पेड़
को
फलदार
शजर
जाना
है
ख़ुश्क
मश्कीज़ा
लिए
ख़ाली
पलटना
है
उसे
और
दरियाओं
का
शीराज़ा
बिखर
जाना
है
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Rakib Mukhtar
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वो
इतना
ढेर
हसीं
था
कि
हम
पे
वाजिब
है
तमाम
उम्र
बिछड़ने
का
ग़म
किया
जाए
Rakib Mukhtar
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दिलासा
देते
हुए
लोग
क्या
समझ
पाते
हम
एक
शख़्स
नहीं
काएनात
हारे
थे
Rakib Mukhtar
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