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Rakib Mukhtar
vo itnaa dher haseen tha ki ham pe waajib hai
vo itnaa dher haseen tha ki ham pe waajib hai | वो इतना ढेर हसीं था कि हम पे वाजिब है
- Rakib Mukhtar
वो
इतना
ढेर
हसीं
था
कि
हम
पे
वाजिब
है
तमाम
उम्र
बिछड़ने
का
ग़म
किया
जाए
- Rakib Mukhtar
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ये
रिज़्क़-ए-अश्क
फ़राहम
बहम
किया
जाए
हमारी
आँख
पे
रहम-ओ-करम
किया
जाए
मुरीदनी
के
दुपट्टे
की
सम्त
लपका
था
जनाब-ए-पीर
का
बाज़ू
क़लम
किया
जाए
वो
इतना
ढ़ेर
हसीं
था
कि
हम
पे
वाजिब
है
तमाम
उम्र
बिछड़ने
का
ग़म
किया
जाए
ज़मीं
को
अर्श-ए-मुअल्ला
तलक
रिसाई
मिले
फ़लक
को
खींच
के
मिट्टी
में
ज़म
किया
जाए
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Rakib Mukhtar
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हुक्म-ए-मुर्शिद
पे
ही
जी
उठना
है
मर
जाना
है
इश्क़
जिस
सम्त
भी
ले
जाए
उधर
जाना
है
लड़खड़ाता
हूँ
तो
वो
रो
के
लिपट
जाता
है
मैंने
गिरना
है
तो
उस
शख़्स
ने
मर
जाना
है
उसकी
छाँव
में
भी
थक
कर
नहीं
बैठा
जाता
तूने
जिस
पेड़
को
फलदार
शजर
जाना
है
ख़ुश्क
मश्कीज़ा
लिए
ख़ाली
पलटना
है
उसे
और
दरियाओं
का
शीराज़ा
बिखर
जाना
है
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Rakib Mukhtar
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मुझ
ऐसा
शख़्स
अगर
क़हक़हों
से
भर
जाए
ये
साँस
लेती
उदासी
तो
घुट
के
मर
जाए
वो
मेरे
बाद
तरस
जाएगा
मोहब्बत
को
उसे
ये
कहना
अगर
हो
सके
तो
मर
जाए
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Rakib Mukhtar
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ये
सानेहा
भी
हुआ
है
तेरी
ख़ुदाई
में
तलाक़
दी
गई
दुल्हन
को
मुँह
दिखाई
में
ये
और
बात
कि
हम
माँगते
नहीं
वर्ना
हमारा
हिस्सा
है
दुनिया
की
पाई
पाई
में
शदीद
ग़ुस्से
में
सतरंगी
चूड़ियों
के
साथ
हमारा
दिल
भी
है
टूटा
तेरी
कलाई
में
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Rakib Mukhtar
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दिलासा
देते
हुए
लोग
क्या
समझ
पाते
हम
एक
शख़्स
नहीं
काएनात
हारे
थे
Rakib Mukhtar
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