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Raghav Ramkaran
gumsum maali dekh raha hooñ
gumsum maali dekh raha hooñ | गुमसुम माली देख रहा हूँ
- Raghav Ramkaran
गुमसुम
माली
देख
रहा
हूँ
आँख
सवाली
देख
रहा
हूँ
बाबू
जी
के
हाथ
भी
देखे
और
कुदाली
देख
रहा
हूँ
पंछी
से
था
प्यार
मुझे
तो
पिंजरा
ख़ाली
देख
रहा
हूँ
डूब
रहा
है
मेरा
सूरज
और
मैं
लाली
देख
रहा
हूँ
तुम
भी
देखो
दुनिया
में
कुछ
मैं
हरियाली
देख
रहा
हूँ
बस्ती
का
अहवाल
न
पूँछो
मन्ज़र
ख़ाली
देख
रहा
हूँ
- Raghav Ramkaran
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किस
ने
हमारे
शहर
पे
मारी
है
रौशनी
हर
इक
मकाँ
के
ज़ख़्म
से
जारी
है
रौशनी
Nomaan Shauque
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यूँँ
ही
नहीं
बस्ती
जली,
यूँँ
ही
नहीं
सब
लड़
मरे
कुछ
लोग
आए
बाहरी,
फिर
मज़हबी
दंगा
हुआ
Ankit Raj
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हैं
बाशिंदे
उसी
बस्ती
के
हम
भी
सो
ख़ुद
पर
भी
भरोसा
क्यूँ
करें
हम
Jaun Elia
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शहर-वालों
की
मोहब्बत
का
मैं
क़ायल
हूँ
मगर
मैंने
जिस
हाथ
को
चूमा
वही
ख़ंजर
निकला
Ahmad Faraz
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चैन
की
बाँसुरी
बजाइये
आप
शहर
जलता
है
और
गाइये
आप
हैं
तटस्थ
या
कि
आप
नीरो
हैं
असली
सूरत
ज़रा
दिखाइये
आप
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Gorakh Pandey
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आदत
सी
बना
ली
है
तुमने
तो
'मुनीर'
अपनी
जिस
शहर
में
भी
रहना
उकताए
हुए
रहना
Muneer Niyazi
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कोई
शहर
था
जिसकी
एक
गली
मेरी
हर
आहट
पहचानती
थी
मेरे
नाम
का
इक
दरवाज़ा
था
इक
खिड़की
मुझको
जानती
थी
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Ali Zaryoun
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घर
पहुँचता
है
कोई
और
हमारे
जैसा
हम
तेरे
शहरस
जाते
हुए
मर
जाते
हैं
Abbas Tabish
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दिल
की
बस्ती
पुरानी
दिल्ली
है
जो
भी
गुज़रा
है
उसने
लूटा
है
Bashir Badr
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हमने
पर्चे
आँसुओं
से
भर
दिए
और
तुमने
इतने
कम
नंबर
दिए
ऊंचे
नीचे
घर
थे
बस्ती
में
बहुत
जलजले
ने
सब
बराबर
कर
दिए
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Zubair Ali Tabish
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ऐसे
कब
तक
उसे
निहारा
जाएगा
यूँँ
ही
क्या
ये
साल
गुज़ारा
जाएगा
रोज़
करोडों
जंगल
मिटते
जाते
हैं
और
कहाँ
तक
पाँव
पसारा
जाएगा
इस
घर
में
जो
बच्चा
रोया
करता
है
वो
बच्चा
किस
रोज़
दुलारा
जाएगा
हाकिम
के
कानों
के
परदे
फट
जाएँ
किस
दिन
इतना
तेज़
पुकारा
जाएगा
पेडों
से
कर
प्यार,
नदी
से
कर
यारी
वरना
तू
बेमौत
ही
मारा
जाएगा
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Raghav Ramkaran
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बेचैनियों
का
अपनी
सबब
जान
लीजिए
डर
क्यूँ
रही
हो?
दिल
का
कहा
मान
लीजिए
Raghav Ramkaran
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बर्बादी
की
राह
बताने
वाले
हैं
ये
जो
सारे
लोग
ज़माने
वाले
हैं
हम
पर
क्या
इल्ज़ाम
लगाओगे
लोगों
हम
तो
गंगा
रोज़
नहाने
वाले
हैं
दिल
के
तार
बजाना
हम
सेे
सीखोगी?
हम
चेले
उस्ताद
घराने
वाले
हैं
सुनने
वालों
क़लम
उठाओ
लिख
डालो
अब
हम
अपना
हाल
सुनाने
वाले
हैं
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Raghav Ramkaran
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लफ्ज़
तुम्हारे
लब
तक
आना
भूल
गए
क्या
तुम
मेरी
ग़ज़लें
गाना
भूल
गए
अब
तो
पंछी
जंगल-जंगल
दिखते
हैं
लगता
है
वो
गाँव
का
दाना
भूल
गए
शहर
में
जब
से
पढ़ने
आया
हूँ
तब
से
बाबू
जी!
मुझ
पर
झुँझलाना
भूल
गए
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Raghav Ramkaran
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मेरी
आँखों
का
पर्दा
जा
रहा
है
कोई
रस्ता
निकलता
आ
रहा
है
रहूँ
आख़िर
मैं
अब
ख़ामोश
कैसे
मेरे
अंदर
कोई
चिल्ला
रहा
है
ग़मों
का
बोझ
है
या
और
ही
कुछ
तेरा
चेहरा
बदलता
जा
रहा
है
तेरी
बातें,
तेरी
बातों
का
जादू
ये
लड़का
इन
में
फँसता
जा
रहा
है
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Raghav Ramkaran
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