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Qamar Saqi
ik dabey aks ko ukera jaayeus ke kaandhe pe haath fera jaa.e
ik dabey aks ko ukera jaayeus ke kaandhe pe haath fera jaa.e | इक दबे अक्स को उकेरा जाए
- Qamar Saqi
इक
दबे
अक्स
को
उकेरा
जाए
उस
के
काँधे
पे
हाथ
फेरा
जाए
तोड़
कर
अब
शनावरी
के
उसूल
रात
भर
बिस्तरों
पे
तैरा
जाए
चंद
जिस्मों
को
धूप
में
रख
कर
आज
परछाइयों
को
घेरा
जाए
अब
मिरी
दौड़ने
की
ख़्वाहिश
है
फ़र्श
पे
आग
को
बिखेरा
जाए
- Qamar Saqi
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धूप
निकली
है
बारिशों
के
ब'अद
वो
अभी
रो
के
मुस्कुराए
हैं
Anjum Ludhianvi
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रुकें
तो
धूप
से
नज़रें
बचाते
रहते
हैं
चलें
तो
कितने
दरख़्त
आते
जाते
रहते
हैं
Charagh Sharma
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उस
वक़्त
भी
अक्सर
तुझे
हम
ढूँढने
निकले
जिस
धूप
में
मज़दूर
भी
छत
पर
नहीं
जाते
Munawwar Rana
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मैं
बे-ख़याल
कभी
धूप
में
निकल
आऊँ
तो
कुछ
सहाब
मिरे
साथ
साथ
चलते
हैं
Farhat Abbas Shah
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रिश्तों
को
जब
धूप
दिखाई
जाती
है
सिगरेट
से
सिगरेट
सुलगाई
जाती
है
Ankit Gautam
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गहरी
सोचें
लम्बे
दिन
और
छोटी
रातें
वक़्त
से
पहले
धूप
सरों
पे
आ
पहुँची
Aanis Moin
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काँटों
से
दिल
लगाओ
जो
ता-उम्र
साथ
दें
फूलों
का
क्या
जो
साँस
की
गर्मी
न
सह
सकें
Akhtar Shirani
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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तुम
तो
सर्दी
की
हसीं
धूप
का
चेहरा
हो
जिसे
देखते
रहते
हैं
दीवार
से
जाते
हुए
हम
Nomaan Shauque
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हाल
पूछा
न
करे
हाथ
मिलाया
न
करे
मैं
इसी
धूप
में
ख़ुश
हूँ
कोई
साया
न
करे
Kashif Husain Ghair
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अभी
तक
आँख
से
लिपटे
हुए
हैं
वो
हंगा
में
जो
अन-देखे
हुए
हैं
तुम्हारे
होश
तो
सालिम
हैं
लेकिन
हमारे
बाल
तो
बिखरे
हुए
हैं
सफ़र
का
वक़्त
रौशन
हो
रहा
है
बदन
पे
रास्ते
उभरे
हुए
हैं
बहादुर
इस
तजस्सुस
में
हैं
ग़लताँ
हमारे
सर
कहाँ
रक्खे
हुए
हैं
चराग़ो
किस
से
इतना
डर
रहे
हो
हवा
के
दाँत
तो
टूटे
हुए
हैं
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Qamar Saqi
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बुलंद-ओ-पस्त
को
हमवार
कर
के
आया
हूँ
मैं
आसमाँ
पे
ज़मीं
से
उतर
के
आया
हूँ
हज़ार
जिस्म
के
दरिया
थे
मेरी
राहों
में
न
जाने
कितने
भँवर
पार
कर
के
आया
हूँ
वो
इक
मज़ाक़
जिसे
लोग
इश्क़
कहते
हैं
मैं
उस
मज़ाक़
का
जुर्माना
भर
के
आया
हूँ
अब
इस
से
आगे
ख़ुदा
जाने
कब
बिखर
जाऊँ
यहाँ
तलक
तो
बहुत
बन
सँवर
के
आया
हूँ
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Qamar Saqi
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आख़िरश
दर्द
या
दवा
था
मैं
ज़िंदगी
तू
बता
कि
क्या
था
मैं
मैं
कभी
इक
जगह
रुका
ही
नहीं
ऐसा
लगता
है
कि
हवा
था
मैं
हाँ
मुझे
ख़ुद
को
ज़ेर
करना
पड़ा
अपने
रास्ते
में
आ
रहा
था
मैं
ऐ
'क़मर'
अब
मुझे
भी
याद
नहीं
आख़िरी
बार
कब
हँसा
था
मैं
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Qamar Saqi
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हद
मोहब्बत
की
पार
भी
कर
ली
और
फिर
ख़ुद
पे
शा'इरी
कर
ली
उस
क़नाअत-पसंद
से
मिल
कर
मेरे
ग़ुस्से
ने
ख़ुद-कुशी
कर
ली
हिज्र
का
एक
पल
भी
सह
न
सका
उस
के
ऑफ़िस
में
नौकरी
कर
ली
नींद
को
आँख
पर
लपेट
लिया
और
फिर
रात
की
घड़ी
कर
ली
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Qamar Saqi
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किस
की
ख़्वाहिश
में
जल
रहा
है
बदन
मोम
जैसा
पिघल
रहा
है
बदन
धीरे
धीरे
बदल
रहे
हैं
ख़याल
रफ़्ता
रफ़्ता
बदल
रहा
है
बदन
दुख
के
काँटों
पे
सो
रहा
हूँ
मैं
ग़म
के
शो'लों
पे
जल
रहा
है
बदन
हुस्न-ए-पुर-नूर
से
लिपटने
को
पागलों
सा
मचल
रहा
है
बदन
सज
पे
खिल
रहे
हैं
वस्ल
के
फूल
रात
पे
इत्र
मल
रहा
है
बदन
सुब्ह
होने
को
है
'क़मर'
साहब
इक
बदन
से
निकल
रहा
है
बदन
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Qamar Saqi
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