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Qamar Saqi
buland-o-past ko hamvaar kar ke aaya hooñ
buland-o-past ko hamvaar kar ke aaya hooñ | बुलंद-ओ-पस्त को हमवार कर के आया हूँ
- Qamar Saqi
बुलंद-ओ-पस्त
को
हमवार
कर
के
आया
हूँ
मैं
आसमाँ
पे
ज़मीं
से
उतर
के
आया
हूँ
हज़ार
जिस्म
के
दरिया
थे
मेरी
राहों
में
न
जाने
कितने
भँवर
पार
कर
के
आया
हूँ
वो
इक
मज़ाक़
जिसे
लोग
इश्क़
कहते
हैं
मैं
उस
मज़ाक़
का
जुर्माना
भर
के
आया
हूँ
अब
इस
से
आगे
ख़ुदा
जाने
कब
बिखर
जाऊँ
यहाँ
तलक
तो
बहुत
बन
सँवर
के
आया
हूँ
- Qamar Saqi
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फूलों
की
सेज
पर
ज़रा
आराम
क्या
किया
उस
गुल-बदन
पे
नक़्श
उठ
आए
गुलाब
के
Adil Mansuri
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मैं
जानता
हूँ
तेरी
रूह
की
तलब
जानाँ
तुझे
बदन
की
तरफ़
से
नहीं
छूउँगा
मैं
Subhan Asad
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हलाल
रिज़्क़
का
मतलब
किसान
से
पूछो
पसीना
बन
के
बदन
से
लहू
निकलता
है
Aadil Rasheed
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सख़्त
सर्दी
में
ठिठुरती
है
बहुत
रूह
मिरी
जिस्म-ए-यार
आ
कि
बेचारी
को
सहारा
मिल
जाए
Farhat Ehsaas
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ये
जानते
हैं
ठीक
नहीं
माँग
रहे
हैं
हम
एक
खंडहर
को
मकीं
माँग
रहे
हैं
सब
माँग
रहे
हैं
ख़ुदास
तेरा
जिस्म
और
हम
हैं,
कि
फ़क़त
तेरी
जबीं
माँग
रहे
हैं
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Siddharth Saaz
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मिरे
सूरज
आ!
मिरे
जिस्म
पे
अपना
साया
कर
बड़ी
तेज़
हवा
है
सर्दी
आज
ग़ज़ब
की
है
Shahryar
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बदन
का
ज़िक्र
बातिल
है
तो
आओ
बिना
सर
पैर
की
बातें
करेंगे
Fahmi Badayuni
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रंग-ओ-रस
की
हवस
और
बस
मसअला
दस्तरस
और
बस
यूँँ
बुनी
हैं
रगें
जिस्म
की
एक
नस
टस
से
मस
और
बस
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Ammar Iqbal
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तुमने
कैसे
उसके
जिस्म
की
ख़ुशबू
से
इनकार
किया
उस
पर
पानी
फेंक
के
देखो
कच्ची
मिट्टी
जैसा
है
Tehzeeb Hafi
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किसी
कली
किसी
गुल
में
किसी
चमन
में
नहीं
वो
रंग
है
ही
नहीं
जो
तिरे
बदन
में
नहीं
Farhat Ehsaas
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इस
लिए
हर
तरफ़
अँधेरा
है
इस
इलाक़े
का
चाँद
बूढ़ा
है
ऐ
ख़लाओं
में
चीख़ने
वाले
तू
मिरी
ख़ामुशी
का
बेटा
है
ऐ
हसीं
सब्ज़
जिस्म
के
मालिक
ये
बता
फूल
कब
महकता
है
तुम
'क़मर'
जिस
में
डूब
जाते
हो
उस
समुंदर
में
एक
रस्ता
है
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Qamar Saqi
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किस
की
ख़्वाहिश
में
जल
रहा
है
बदन
मोम
जैसा
पिघल
रहा
है
बदन
धीरे
धीरे
बदल
रहे
हैं
ख़याल
रफ़्ता
रफ़्ता
बदल
रहा
है
बदन
दुख
के
काँटों
पे
सो
रहा
हूँ
मैं
ग़म
के
शो'लों
पे
जल
रहा
है
बदन
हुस्न-ए-पुर-नूर
से
लिपटने
को
पागलों
सा
मचल
रहा
है
बदन
सज
पे
खिल
रहे
हैं
वस्ल
के
फूल
रात
पे
इत्र
मल
रहा
है
बदन
सुब्ह
होने
को
है
'क़मर'
साहब
इक
बदन
से
निकल
रहा
है
बदन
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Qamar Saqi
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इक
दबे
अक्स
को
उकेरा
जाए
उस
के
काँधे
पे
हाथ
फेरा
जाए
तोड़
कर
अब
शनावरी
के
उसूल
रात
भर
बिस्तरों
पे
तैरा
जाए
चंद
जिस्मों
को
धूप
में
रख
कर
आज
परछाइयों
को
घेरा
जाए
अब
मिरी
दौड़ने
की
ख़्वाहिश
है
फ़र्श
पे
आग
को
बिखेरा
जाए
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Qamar Saqi
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अभी
तक
आँख
से
लिपटे
हुए
हैं
वो
हंगा
में
जो
अन-देखे
हुए
हैं
तुम्हारे
होश
तो
सालिम
हैं
लेकिन
हमारे
बाल
तो
बिखरे
हुए
हैं
सफ़र
का
वक़्त
रौशन
हो
रहा
है
बदन
पे
रास्ते
उभरे
हुए
हैं
बहादुर
इस
तजस्सुस
में
हैं
ग़लताँ
हमारे
सर
कहाँ
रक्खे
हुए
हैं
चराग़ो
किस
से
इतना
डर
रहे
हो
हवा
के
दाँत
तो
टूटे
हुए
हैं
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Qamar Saqi
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हद
मोहब्बत
की
पार
भी
कर
ली
और
फिर
ख़ुद
पे
शा'इरी
कर
ली
उस
क़नाअत-पसंद
से
मिल
कर
मेरे
ग़ुस्से
ने
ख़ुद-कुशी
कर
ली
हिज्र
का
एक
पल
भी
सह
न
सका
उस
के
ऑफ़िस
में
नौकरी
कर
ली
नींद
को
आँख
पर
लपेट
लिया
और
फिर
रात
की
घड़ी
कर
ली
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Qamar Saqi
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