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Qamar Saqi
abhii tak aankh se lipate hue hain
abhii tak aankh se lipate hue hain | अभी तक आँख से लिपटे हुए हैं
- Qamar Saqi
अभी
तक
आँख
से
लिपटे
हुए
हैं
वो
हंगा
में
जो
अन-देखे
हुए
हैं
तुम्हारे
होश
तो
सालिम
हैं
लेकिन
हमारे
बाल
तो
बिखरे
हुए
हैं
सफ़र
का
वक़्त
रौशन
हो
रहा
है
बदन
पे
रास्ते
उभरे
हुए
हैं
बहादुर
इस
तजस्सुस
में
हैं
ग़लताँ
हमारे
सर
कहाँ
रक्खे
हुए
हैं
चराग़ो
किस
से
इतना
डर
रहे
हो
हवा
के
दाँत
तो
टूटे
हुए
हैं
- Qamar Saqi
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अस्ल
में
पाया
ही
'दानिश'
तब
उसे
जब
उसे
खोने
का
डर
जाता
रहा
Madan Mohan Danish
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शग़्ल
था
दश्त-नवर्दी
का
कभी
ऐ
'ताबाँ'
अब
गुलिस्ताँ
में
भी
जाते
हुए
डर
लगता
है
Anwar Taban
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पहले
सौ
बार
इधर
और
उधर
देखा
है
तब
कहीं
डर
के
तुम्हें
एक
नज़र
देखा
है
Majrooh Sultanpuri
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परिंद
क्यूँँ
मिरी
शाख़ों
से
ख़ौफ़
खाते
हैं
कि
इक
दरख़्त
हूँ
और
साया-दार
मैं
भी
हूँ
Asad Badayuni
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हमारे
जैसा
कोई
दर-ब-दर
नहीं
होगा
कहीं
पे
होगा
भी
तो
इस
कदर
नहीं
होगा
निकल
गया
हूँ
क़ज़ा
के
परे
तो
मैं
कबका
दे
जहर
भी
कोई
तो
अब
असर
नहीं
होगा
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Aadi Ratnam
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ये
जो
दीवार
अँधेरों
ने
उठा
रक्खी
है
मेरा
मक़्सद
इसी
दीवार
में
दर
करना
है
Azm Shakri
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दिल
को
तेरी
चाहत
पे
भरोसा
भी
बहुत
है
और
तुझ
से
बिछड़
जाने
का
डर
भी
नहीं
जाता
Ahmad Faraz
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वो
कभी
आग़ाज़
कर
सकते
नहीं
ख़ौफ़
लगता
है
जिन्हें
अंजाम
से
Siraj Faisal Khan
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डर
हम
को
भी
लगता
है
रस्ते
के
सन्नाटे
से
लेकिन
एक
सफ़र
पर
ऐ
दिल
अब
जाना
तो
होगा
Javed Akhtar
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तेरे
दर
से
जब
उठ
के
जाना
पड़ेगा
ख़ुद
अपना
जनाज़ा
उठाना
पड़ेगा
Khumar Barabankvi
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इक
दबे
अक्स
को
उकेरा
जाए
उस
के
काँधे
पे
हाथ
फेरा
जाए
तोड़
कर
अब
शनावरी
के
उसूल
रात
भर
बिस्तरों
पे
तैरा
जाए
चंद
जिस्मों
को
धूप
में
रख
कर
आज
परछाइयों
को
घेरा
जाए
अब
मिरी
दौड़ने
की
ख़्वाहिश
है
फ़र्श
पे
आग
को
बिखेरा
जाए
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Qamar Saqi
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बुलंद-ओ-पस्त
को
हमवार
कर
के
आया
हूँ
मैं
आसमाँ
पे
ज़मीं
से
उतर
के
आया
हूँ
हज़ार
जिस्म
के
दरिया
थे
मेरी
राहों
में
न
जाने
कितने
भँवर
पार
कर
के
आया
हूँ
वो
इक
मज़ाक़
जिसे
लोग
इश्क़
कहते
हैं
मैं
उस
मज़ाक़
का
जुर्माना
भर
के
आया
हूँ
अब
इस
से
आगे
ख़ुदा
जाने
कब
बिखर
जाऊँ
यहाँ
तलक
तो
बहुत
बन
सँवर
के
आया
हूँ
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Qamar Saqi
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हद
मोहब्बत
की
पार
भी
कर
ली
और
फिर
ख़ुद
पे
शा'इरी
कर
ली
उस
क़नाअत-पसंद
से
मिल
कर
मेरे
ग़ुस्से
ने
ख़ुद-कुशी
कर
ली
हिज्र
का
एक
पल
भी
सह
न
सका
उस
के
ऑफ़िस
में
नौकरी
कर
ली
नींद
को
आँख
पर
लपेट
लिया
और
फिर
रात
की
घड़ी
कर
ली
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Qamar Saqi
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इस
लिए
हर
तरफ़
अँधेरा
है
इस
इलाक़े
का
चाँद
बूढ़ा
है
ऐ
ख़लाओं
में
चीख़ने
वाले
तू
मिरी
ख़ामुशी
का
बेटा
है
ऐ
हसीं
सब्ज़
जिस्म
के
मालिक
ये
बता
फूल
कब
महकता
है
तुम
'क़मर'
जिस
में
डूब
जाते
हो
उस
समुंदर
में
एक
रस्ता
है
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Qamar Saqi
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किस
की
ख़्वाहिश
में
जल
रहा
है
बदन
मोम
जैसा
पिघल
रहा
है
बदन
धीरे
धीरे
बदल
रहे
हैं
ख़याल
रफ़्ता
रफ़्ता
बदल
रहा
है
बदन
दुख
के
काँटों
पे
सो
रहा
हूँ
मैं
ग़म
के
शो'लों
पे
जल
रहा
है
बदन
हुस्न-ए-पुर-नूर
से
लिपटने
को
पागलों
सा
मचल
रहा
है
बदन
सज
पे
खिल
रहे
हैं
वस्ल
के
फूल
रात
पे
इत्र
मल
रहा
है
बदन
सुब्ह
होने
को
है
'क़मर'
साहब
इक
बदन
से
निकल
रहा
है
बदन
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Qamar Saqi
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