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Qamar Saqi
had mohabbat ki paar bhi kar li
had mohabbat ki paar bhi kar li | हद मोहब्बत की पार भी कर ली
- Qamar Saqi
हद
मोहब्बत
की
पार
भी
कर
ली
और
फिर
ख़ुद
पे
शा'इरी
कर
ली
उस
क़नाअत-पसंद
से
मिल
कर
मेरे
ग़ुस्से
ने
ख़ुद-कुशी
कर
ली
हिज्र
का
एक
पल
भी
सह
न
सका
उस
के
ऑफ़िस
में
नौकरी
कर
ली
नींद
को
आँख
पर
लपेट
लिया
और
फिर
रात
की
घड़ी
कर
ली
- Qamar Saqi
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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निगाह-ए-शोख़
का
क़ैदी
नहीं
है
कौन
यहाँ
किसे
तमन्ना
नहीं
फूल
चूमने
को
मिले
Aks samastipuri
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मुयस्सर
हमें
ख़्वाब-ओ-राहत
कहाँ
ज़रा
आँख
झपकी
सहर
हो
गई
Dagh Dehlvi
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शाम
थी
हिज्र
की
हाल
मत
पूछना
आँख
थकने
लगे
तो
जिगर
रो
पड़े
Piyush Mishra 'Aab'
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तेरी
निगाह-ए-नाज़
से
छूटे
हुए
दरख़्त
मर
जाएँ
क्या
करें
बता
सूखे
हुए
दरख़्त
हैरत
है
पेड़
नीम
के
देने
लगे
हैं
आम
पगला
गए
हैं
आपके
चू
में
हुए
दरख़्त
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Varun Anand
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किसी
की
बर्क़-ए-नज़र
से
न
बिजलियों
से
जले
कुछ
इस
तरह
की
हो
ता'मीर
आशियाने
की
Anwar Taban
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मेरे
दर्द
की
वो
दवा
है
मगर
मेरा
उस
सेे
कोई
भी
रिश्ता
नहीं
मुसलसल
मिलाता
है
मुझ
सेे
नज़र
मैं
कैसे
कहूँ
वो
फ़रिश्ता
नहीं
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S M Afzal Imam
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समुंदर
में
भी
सहरा
देखना
है
मुझे
महफ़िल
में
तन्हा
देख
लेना
Aqib khan
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हम
भी
तुमको
धोखा
दें
ये
ठीक
नहीं
आँख
के
बदले
आँख
कहाँ
तक
जायज़
है
Gaurav Singh
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देर
तक
आँख
मुसीबत
में
पड़ी
रहती
है
तुम
चले
जाते
हो,
तस्वीर
बनी
रहती
है
Fauziya Rabab
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इक
दबे
अक्स
को
उकेरा
जाए
उस
के
काँधे
पे
हाथ
फेरा
जाए
तोड़
कर
अब
शनावरी
के
उसूल
रात
भर
बिस्तरों
पे
तैरा
जाए
चंद
जिस्मों
को
धूप
में
रख
कर
आज
परछाइयों
को
घेरा
जाए
अब
मिरी
दौड़ने
की
ख़्वाहिश
है
फ़र्श
पे
आग
को
बिखेरा
जाए
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Qamar Saqi
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बुलंद-ओ-पस्त
को
हमवार
कर
के
आया
हूँ
मैं
आसमाँ
पे
ज़मीं
से
उतर
के
आया
हूँ
हज़ार
जिस्म
के
दरिया
थे
मेरी
राहों
में
न
जाने
कितने
भँवर
पार
कर
के
आया
हूँ
वो
इक
मज़ाक़
जिसे
लोग
इश्क़
कहते
हैं
मैं
उस
मज़ाक़
का
जुर्माना
भर
के
आया
हूँ
अब
इस
से
आगे
ख़ुदा
जाने
कब
बिखर
जाऊँ
यहाँ
तलक
तो
बहुत
बन
सँवर
के
आया
हूँ
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Qamar Saqi
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किस
की
ख़्वाहिश
में
जल
रहा
है
बदन
मोम
जैसा
पिघल
रहा
है
बदन
धीरे
धीरे
बदल
रहे
हैं
ख़याल
रफ़्ता
रफ़्ता
बदल
रहा
है
बदन
दुख
के
काँटों
पे
सो
रहा
हूँ
मैं
ग़म
के
शो'लों
पे
जल
रहा
है
बदन
हुस्न-ए-पुर-नूर
से
लिपटने
को
पागलों
सा
मचल
रहा
है
बदन
सज
पे
खिल
रहे
हैं
वस्ल
के
फूल
रात
पे
इत्र
मल
रहा
है
बदन
सुब्ह
होने
को
है
'क़मर'
साहब
इक
बदन
से
निकल
रहा
है
बदन
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Qamar Saqi
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अभी
तक
आँख
से
लिपटे
हुए
हैं
वो
हंगा
में
जो
अन-देखे
हुए
हैं
तुम्हारे
होश
तो
सालिम
हैं
लेकिन
हमारे
बाल
तो
बिखरे
हुए
हैं
सफ़र
का
वक़्त
रौशन
हो
रहा
है
बदन
पे
रास्ते
उभरे
हुए
हैं
बहादुर
इस
तजस्सुस
में
हैं
ग़लताँ
हमारे
सर
कहाँ
रक्खे
हुए
हैं
चराग़ो
किस
से
इतना
डर
रहे
हो
हवा
के
दाँत
तो
टूटे
हुए
हैं
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Qamar Saqi
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इस
लिए
हर
तरफ़
अँधेरा
है
इस
इलाक़े
का
चाँद
बूढ़ा
है
ऐ
ख़लाओं
में
चीख़ने
वाले
तू
मिरी
ख़ामुशी
का
बेटा
है
ऐ
हसीं
सब्ज़
जिस्म
के
मालिक
ये
बता
फूल
कब
महकता
है
तुम
'क़मर'
जिस
में
डूब
जाते
हो
उस
समुंदर
में
एक
रस्ता
है
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Qamar Saqi
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