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Qamar Saqi
kis ki KHvaahish men jal raha hai badan
kis ki KHvaahish men jal raha hai badan | किस की ख़्वाहिश में जल रहा है बदन
- Qamar Saqi
किस
की
ख़्वाहिश
में
जल
रहा
है
बदन
मोम
जैसा
पिघल
रहा
है
बदन
धीरे
धीरे
बदल
रहे
हैं
ख़याल
रफ़्ता
रफ़्ता
बदल
रहा
है
बदन
दुख
के
काँटों
पे
सो
रहा
हूँ
मैं
ग़म
के
शो'लों
पे
जल
रहा
है
बदन
हुस्न-ए-पुर-नूर
से
लिपटने
को
पागलों
सा
मचल
रहा
है
बदन
सज
पे
खिल
रहे
हैं
वस्ल
के
फूल
रात
पे
इत्र
मल
रहा
है
बदन
सुब्ह
होने
को
है
'क़मर'
साहब
इक
बदन
से
निकल
रहा
है
बदन
- Qamar Saqi
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ग़म-ए-हयात
ने
आवारा
कर
दिया
वर्ना
थी
आरज़ू
कि
तिरे
दर
पे
सुब्ह
ओ
शाम
करें
Majrooh Sultanpuri
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लोग
हम
सेे
सीखते
हैं
ग़म
छुपाने
का
हुनर
आओ
तुमको
भी
सिखा
दें
मुस्कुराने
का
हुनर
क्या
ग़ज़ब
है
तजरबे
की
भेंट
तुम
ही
चढ़
गए
तुम
से
ही
सीखा
था
हमने
दिल
दुखाने
का
हुनर
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Kashif Sayyed
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पुराने
घाव
पर
नाखून
उसका
लग
गया
वरना
गुज़र
कर
दर्द
ये
हद
से
दवा
होने
ही
वाला
था
Atul K Rai
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कहीं
से
दुख
तो
कहीं
से
घुटन
उठा
लाए
कहाँ-कहाँ
से
न
दीवानापन
उठा
लाए
अजीब
ख़्वाब
था
देखा
के
दर-ब-दर
हो
कर
हम
अपने
मुल्क
से
अपना
वतन
उठा
लाए
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Farhat Abbas Shah
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हम
अपने
दुख
को
गाने
लग
गए
हैं
मगर
इस
में
ज़माने
लग
गए
हैं
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Madan Mohan Danish
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दर्द
सहने
का
अलग
अंदाज़
है
जी
रहे
हैं
हम
अदा
की
ज़िंदगी
Farhat Abbas Shah
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चारासाज़ो
मिरा
इलाज
करो
आज
कुछ
दर्द
में
कमी
सी
है
Azhar Nawaz
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ऐ
ग़म-ए-ज़िंदगी
न
हो
नाराज़
मुझ
को
आदत
है
मुस्कुराने
की
Abdul Hamid Adam
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ज़रा
सा
ग़म
हुआ
और
रो
दिए
हम
बड़ी
नाज़ुक
तबीअत
हो
गई
है
Shahzad Ahmad
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हम
कुछ
ऐसे
उसके
आगे
अपनी
वफ़ा
रख
देते
हैं
बच्चे
जैसे
रेल
की
पटरी
पर
सिक्का
रख
देते
हैं
तस्वीर-ए-ग़म,
दिल
के
आँसू,
रंजो-नदामत,
तन्हाई
उसको
ख़त
लिखते
हैं
ख़त
में
हम
क्या
क्या
रख
देते
हैं
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Subhan Asad
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बुलंद-ओ-पस्त
को
हमवार
कर
के
आया
हूँ
मैं
आसमाँ
पे
ज़मीं
से
उतर
के
आया
हूँ
हज़ार
जिस्म
के
दरिया
थे
मेरी
राहों
में
न
जाने
कितने
भँवर
पार
कर
के
आया
हूँ
वो
इक
मज़ाक़
जिसे
लोग
इश्क़
कहते
हैं
मैं
उस
मज़ाक़
का
जुर्माना
भर
के
आया
हूँ
अब
इस
से
आगे
ख़ुदा
जाने
कब
बिखर
जाऊँ
यहाँ
तलक
तो
बहुत
बन
सँवर
के
आया
हूँ
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Qamar Saqi
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हद
मोहब्बत
की
पार
भी
कर
ली
और
फिर
ख़ुद
पे
शा'इरी
कर
ली
उस
क़नाअत-पसंद
से
मिल
कर
मेरे
ग़ुस्से
ने
ख़ुद-कुशी
कर
ली
हिज्र
का
एक
पल
भी
सह
न
सका
उस
के
ऑफ़िस
में
नौकरी
कर
ली
नींद
को
आँख
पर
लपेट
लिया
और
फिर
रात
की
घड़ी
कर
ली
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Qamar Saqi
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अभी
तक
आँख
से
लिपटे
हुए
हैं
वो
हंगा
में
जो
अन-देखे
हुए
हैं
तुम्हारे
होश
तो
सालिम
हैं
लेकिन
हमारे
बाल
तो
बिखरे
हुए
हैं
सफ़र
का
वक़्त
रौशन
हो
रहा
है
बदन
पे
रास्ते
उभरे
हुए
हैं
बहादुर
इस
तजस्सुस
में
हैं
ग़लताँ
हमारे
सर
कहाँ
रक्खे
हुए
हैं
चराग़ो
किस
से
इतना
डर
रहे
हो
हवा
के
दाँत
तो
टूटे
हुए
हैं
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Qamar Saqi
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इस
लिए
हर
तरफ़
अँधेरा
है
इस
इलाक़े
का
चाँद
बूढ़ा
है
ऐ
ख़लाओं
में
चीख़ने
वाले
तू
मिरी
ख़ामुशी
का
बेटा
है
ऐ
हसीं
सब्ज़
जिस्म
के
मालिक
ये
बता
फूल
कब
महकता
है
तुम
'क़मर'
जिस
में
डूब
जाते
हो
उस
समुंदर
में
एक
रस्ता
है
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Qamar Saqi
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आख़िरश
दर्द
या
दवा
था
मैं
ज़िंदगी
तू
बता
कि
क्या
था
मैं
मैं
कभी
इक
जगह
रुका
ही
नहीं
ऐसा
लगता
है
कि
हवा
था
मैं
हाँ
मुझे
ख़ुद
को
ज़ेर
करना
पड़ा
अपने
रास्ते
में
आ
रहा
था
मैं
ऐ
'क़मर'
अब
मुझे
भी
याद
नहीं
आख़िरी
बार
कब
हँसा
था
मैं
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Qamar Saqi
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