saazishon ki bheed men taariqiyaan sar par uthaaye | साज़िशों की भीड़ में तारीकियाँ सर पर उठाए

  - P P Srivastava Rind
साज़िशोंकीभीड़मेंतारीकियाँसरपरउठाए
बढ़रहेहैंशामकेसाएधुआँसरपरउठाए
रेग-ज़ारोंमेंभटकतीसोचकेकुछख़ुश्कलम्हे
तल्ख़ी-ए-हालातकीहैंदास्ताँसरपरउठाए
ख़्वाहिशोंकीआँचमेंतपतेबदनकीलज़्ज़तेंहैं
औरवहशीरातहैगुमराहियाँसरपरउठाए
चंदगूँगीदस्तकेंहैंघरकेदरवाज़ेकेबाहर
चीख़सन्नाटोंकीहैसारामकाँसरपरउठाए
ज़ेहनमेंठहरीहुईहैएकआँधीमुद्दतोंसे
हममगरफिरतेरहेरेग-ए-रवाँसरपरउठाए
आलम-ए-ला-वारसीमेंजानेकबसेदर-ब-दरहूँ
पुश्तपरमाज़ीकोलादेक़र्ज़-ए-जाँसरपरउठाए
मुज़्तरिबसीरूहहैमेरीभटकताफिररहाहूँ
मैंकईजन्मोंसेहूँबार-ए-गिराँसरपरउठाए
'रिंद'जबबे-सम्तियोंमेंख़ुश्कपत्तेउड़रहेहों
तोहमतेंकिसकेलिएशाम-ए-ख़िज़ाँसरपरउठाए
  - P P Srivastava Rind
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