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Ankur Mishra
naam ab uskaa bataane se rahe
naam ab uskaa bataane se rahe | नाम अब उसका बताने से रहे
- Ankur Mishra
नाम
अब
उसका
बताने
से
रहे
हम
ये
पर्दा
अब
उठाने
से
रहे
एक
मुद्दत
तक
तलाशा
है
उसे
कर्ज़
कोई
हम
चुकाने
से
रहे
आके
ले
ले
कोई
चाहे
इम्तिहान
हम
कोई
पर्चा
दिखाने
से
रहे
हमनें
सब
सेे
ही
रखा
है
फ़ासला
तुम
हमें
अब
आज़माने
से
रहे
हम
निकल
आए
हैं
उस
दर
से
भी
अब
हम
वफ़ा
तुम
सेे
निभाने
से
रहे
- Ankur Mishra
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मेरे
ही
संग-ओ-ख़िश्त
से
तामीर-ए-बाम-ओ-दर
मेरे
ही
घर
को
शहर
में
शामिल
कहा
न
जाए
Majrooh Sultanpuri
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लिपट
जाते
हैं
वो
बिजली
के
डर
से
इलाही
ये
घटा
दो
दिन
तो
बरसे
Dagh Dehlvi
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कोई
ख़ुद-कुशी
की
तरफ़
चल
दिया
उदासी
की
मेहनत
ठिकाने
लगी
Adil Mansuri
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तू
किसी
और
ही
दुनिया
में
मिली
थी
मुझ
सेे
तू
किसी
और
ही
मौसम
की
महक
लाई
थी
डर
रहा
था
कि
कहीं
ज़ख़्म
न
भर
जाएँ
मेरे
और
तू
मुट्ठियाँ
भर-भर
के
नमक
लाई
थी
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Tehzeeb Hafi
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ये
जो
दीवार
अँधेरों
ने
उठा
रक्खी
है
मेरा
मक़्सद
इसी
दीवार
में
दर
करना
है
Azm Shakri
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मुझ
ऐसा
शख़्स
अगर
क़हक़हों
से
भर
जाए
ये
साँस
लेती
उदासी
तो
घुट
के
मर
जाए
वो
मेरे
बाद
तरस
जाएगा
मोहब्बत
को
उसे
ये
कहना
अगर
हो
सके
तो
मर
जाए
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Rakib Mukhtar
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मैं
बार
बार
तुझे
देखता
हूॅं
इस
डर
से
कि
पिछली
बार
का
देखा
हुआ
ख़राब
न
हो
Shaheen Abbas
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ऐसा
लगता
है
कि
तन्हाई
मुझे
छूती
है
उँगलियाँ
कौन
फिरोता
है
मेरे
बालों
में
Ashok Mizaj Badr
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शे'र
दर-अस्ल
हैं
वही
'हसरत'
सुनते
ही
दिल
में
जो
उतर
जाएँ
Hasrat Mohani
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यूँँ
देखिए
तो
आँधी
में
बस
इक
शजर
गया
लेकिन
न
जाने
कितने
परिंदों
का
घर
गया
जैसे
ग़लत
पते
पे
चला
आए
कोई
शख़्स
सुख
ऐसे
मेरे
दर
पे
रुका
और
गुज़र
गया
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Rajesh Reddy
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दस्तरस
में
आख़िरी
तस्वीर
है
क्या
दो
घड़ी
की
ज़िंदगी
जागीर
है
क्या
जिन
अँधेरों
से
मिला
था
रौशनी
में
उस
अँधेरे
की
चमकती
पीर
है
क्या
आज़माने
लौट
आई
फिर
दुबारा
यार
ये
बारिश
ही
मेरी
हीर
है
क्या
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Ankur Mishra
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है
जहाँ
सारा
अपना
मगर
घर
कहाँ
हम
परिंदों
का
कोई
मुक़द्दर
कहाँ
इन
लकीरों
में
रहती
है
तन्हा
सहर
दूर
मुझ
सेे
सनम
वो
सितमगर
कहाँ
जिस्म
से
नोच
लेती
है
कपड़े
तलक़
सिलवटें
यार
आँखों
के
अंदर
कहाँ
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Ankur Mishra
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ज़ुल्फ़ों
में
अपनी
सजा
कर
ले
गया
मुझको
चुरा
कर
देखता
हूँ
रास्ता
मैं
सामने
उसको
बिठा
कर
काट
ली
अपनी
कलाई
नाम
फिर
उसका
मिटा
कर
सोचता
हूँ
कैसे
होगा
मसअला
हल
ज़हर
खा
कर
लौट
आ
ऐ
ज़िंदगी
अब
हाथ
'अंकुर'
से
छुड़ा
कर
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Ankur Mishra
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और
कितने
ज़ख़्म
खाऍंगे
कब
तलक
ऐसा
निभाएँगे
ख़ौफ़
खाते
हैं
जो
ख़ुद
से
ही
आइने
की
सम्त
आऍंगे
पा
न
पाए
पार
अश्कों
से
प्यास
किसकी
क्या
बुझाऍंगे
कर
लिया
है
राब्ता
ख़ुद
से
अब
यक़ीनन
गुम
हो
जाऍंगे
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Ankur Mishra
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वो
ज़मीं
आसमाँ
वो
सहर
फिर
ढूँढता
हूँ
वो
अहल-ए-नज़र
फिर
राज़
से
राज़
गहरा
हुआ
जब
याद
आए
मुझे
वो
अधर
फिर
मर
गई
ख़्वाहिशें
भर
गया
दिल
जी
उठी
इक
तमन्ना
मगर
फिर
इसलिए
याद
रखता
हूँ
उसको
याद
आए
न
उसकी
बशर
फिर
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Ankur Mishra
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