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Ankur Mishra
Aur kitne zakhm khayenge
और कितने ज़ख़्म खाऍंगे
- Ankur Mishra
और
कितने
ज़ख़्म
खाऍंगे
कब
तलक
ऐसा
निभाएँगे
ख़ौफ़
खाते
हैं
जो
ख़ुद
से
ही
आइने
की
सम्त
आऍंगे
पा
न
पाए
पार
अश्कों
से
प्यास
किसकी
क्या
बुझाऍंगे
कर
लिया
है
राब्ता
ख़ुद
से
अब
यक़ीनन
गुम
हो
जाऍंगे
- Ankur Mishra
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काश
थोड़ा
ख़ुद
से
हम
भी
राब्ता
रखते
दरमियाँ
दोनों
के
इक
तो
आइना
रखते
इस
तरह
होती
न
तन्हा
यार
तन्हाई
हम
अगर
ख़ाली
न
दिल
ये
जा-ब-जा
रखते
मुतमइन
हैं
अश्क
'अंकुर'
बह
निकलते
हैं
किस
तरह
होंठों
पे
भीगी
हम
सदा
रखते
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जिस्म
जलने
लगा
है
तिरी
तिश्नगी
से
सनम
प्यास
बुझती
नहीं
क्यूँ
मिरी
मय-कशी
से
सनम
एक
अर्सा
हुआ
क्यूँ
तिरी
याद
आई
नहीं
एक
अर्सा
हुआ
बिछड़े
मुझ
को
ख़ुशी
से
सनम
देख
कर
आइना
सोचता
हूँ
मैं
अक्सर
यही
टूट
जाए
न
रिश्ता
कहीं
बे-ख़ुदी
से
सनम
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फिर
उसी
आब-ए-हया
से
मिलना
है
अपने
ख़ुदास
रंग
गहरा
है
बहुत
पर
बचना
है
तर्क-ए-दुआ
से
मिल
ही
जाएगा
कभी
वो
देखता
है
जिस
अदास
देर
से
ही
अब
सही
पर
धड़का
तो
दिल
ये
दवा
से
इश्क़
कर
लेता
मैं
भी
पर
डर
गया
था
मैं
वफ़ा
से
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सौ
बहाने
थे
जब
ख़ुद-कुशी
के
ख़्वाब
देखे
थे
तब
ज़िंदगी
के
इस
तरह
छोड़
कर
ख़ुद
को
कैसे
यार
होते
कभी
हम
किसी
के
ख़्वाब
आँखों
में
तन्हा
हैं
जानाँ
पी
गया
अश्क
कोई
सभी
के
कब
तलक
इस
तरह
हम
किसी
को
ज़ख़्म
'अंकुर'
दिखाएँ
किसी
के
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इक
सी
तासीर
इक
सी
ही
तक़दीर
हो
ये
ज़रूरी
नहीं
बे-वफ़ा
हीर
हो
याद
रखने
को
इक
याद
ही
काफ़ी
है
पास
कोई
ज़रूरी
है
तस्वीर
हो
दर्द
लाज़िम
है
उल्फ़त
में
माना
मगर
आँख
में
प्यास
भर
तो
सनम
नीर
हो
मान
लूँगा
मैं
भी
हार
अपनी
सनम
इश्क़
सी
कोई
उसको
अगर
पीर
हो
कब
से
बैठा
हूँ
दीदार
को
उसके
मैं
अब
तो
'अंकुर'
दु'आ
मेरी
तामीर
हो
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